Wednesday, September 18, 2013

कही अनकही कविता हूँ मैं



समर शेष बहुत जीवन का
अभी कहा जीता हूँ मैं 
बाहर से बैचैन बहुत 
भीतर तक रीता हूँ मैं 

मौन मंथन रत एकाकी 
विकल हला पीता हूँ मैं 
एक स्वांस में मरा अभी 
एक स्वांस अभी जीता हूँ मैं 

संग्राम बीच ही रची गयी 
विस्मृत विगत रत गीता हूँ मैं 
मर्यादा की बलिवेदी पर चिर 
अर्पित मानस धर्मा सीता हूँ मैं 

लोभ बहुत है मोह बहुत 
करने कहने को अरमान बहुत 
क्या कहूँ समय बीता मुझ पर 
या विराट समय पर बीता हूँ मैं 

सहज बनावट पर नहीं सरल 
अगढ़ निपट ढिठा हूँ मैं 
पकड़ नहीं पाया खुद को 
स्व से चिपटा चीठा हूँ मैं 

क्या करू स्वयं को अनुदित 
कटु अमिय करील सा मीठा हूँ मैं 
बाहर से बैचैन बहुत 
भीतर तक रीता हूँ मैं !