Thursday, May 11, 2017

वो रोज अनशन करता है



वो रोज अनशन करता है  

फुटपाथ पर 
झोपड़ों में 
जंगलों 
दुरान्चलों 
और 
तुम्हारी गली में भी 

भूख 
और 
गरीबी के खिलाफ 
जो 
रची 
थोपी 
गयी है 
पीढ़ी दर पीढ़ी  
उनके 
और 
उनकी 
संतानों द्वारा 
इन पर 
इनके 
बाप 
दादाओं पर 
वो 
तभी से 
अनशन पर है 

उसकी 
मंशा है 
कि 

कोई भी 
कभी भी 
तुड़वा सकता है 
उसका
अनिश्चितकालीन 
आमरण अनशन 
देकर 
एक टुकड़ा 
बासी रोटी 
सड़ा अनाज 
या 
जूठन ही 
मानवता के 
उत्सवी जनाजों की 

उड़ती उड़ती 
अफवाह है 
अब 
इसका भी 
बड़ा बाजार है 
वो मायूस तो है ही 
मरने को है 
ये जानकर कि 
भूख 
अब डर नहीं 
साधन बन गयी है 
डराने का 

वो जो 
नगर चौक पे 
गद्दों पर पसरा 
भीड़ से घिरा 
अनशना रहा है 
कुंवर है 
ऊँचे घराने का  |

अनशन 
अब सीढ़ी है 
स्वार्थ की 
इससे निबटना 
जानती है 
सामंती सत्ता 
वो डरती नहीं 
आकलन करती है 
भीड़ में 
विरोधी वोटों का 

उसका 
आमरण अनशन
हमेशा 
सफल रहा है 
मरण बन कर 
उसके साथ ही  
मिट जायेगी 
भूख 
गरीबी 
और 
नाकामियाँ 
नाकारा 
सरकार की |

Wednesday, May 10, 2017

कोई खबर नहीं उनकी



कोई खबर नहीं उनकी 
वो गए है 
जब से सरहदों पे 

मेहंदी भी 
अभी तो हाथों से 
छूटी ना थी 
और बुला ले गयी 
बैरन ड्यूटी साजन को 

ओह रे देसवा 
मन भी नहीं 
तुझे क्या कहु 
तेरे ही खातिर तो 
जी रही हूँ मै 
यहाँ 
और खट रहे है 
पिया
वहा 

सरहदों पे 
बजती है 
दिन रात 
दिलों की है 
वो धड़कने....सुनो तो जरा 
हुजूर 
साहेबान  

Thursday, May 4, 2017

एक सार्वभौम प्रासंगिक सन्दर्भ : मधुसूदन उवाच ! (गीता : द्वितीय अध्याय - भाग १ )



तब उस 
करुणामूर्ति ने 
करुणापूरित 
अश्रुरत 
नत नयन 
भीत भी 
क्लांत भी 
गांडीव धर चुके 
पस्त हृदय 
अर्जुन के प्रति 
यो कहा 
जैसे 
युगों से कहा 
मधु मर्दन ने 
हां 
जिसने 
स्वयं की माया से 
उत्पन्न 
मधु को 
कैटभ संग 
मरीचिका के उत्तल पर 
जंघा ही को 
धरा कर 
छिन्न मस्तक 
किया था कभी 
उसने 
हां उसने कहा 
तभी तो 
अब तलक ये 
सन्दर्भ 
सार्वभौम और 
प्रासंगिक रहा 
टिका रहा 





source : Bhagwad Geeta , chtr-2, ver -1

सञ्जय उवाच॥

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥२-१॥ .....

तब करुणापूरित वयाकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त अर्जुन से मधु का वध करने वाले श्री भगवान ने ये वचन कहे 

Wednesday, May 3, 2017

मन क्यों उदास है ?



मन क्यों उदास है ?
जाने कैसी ये प्यास है ? 
बुझती नहीं , 
रुकती नहीं , 
बड़ी तेज सांस है || 

क्यों वो मेरा नहीं ? 
जो मिला 
मिला नहीं 
जो नहीं मिला 
क्यों मिला नहीं 
कितने सवालों का 
ना कोई जवाब है || 

परछाइयों सी है 
खुशिया जो मिली 
रुसवाइयों सी है 
वाहवाहियां सभी
फिर भी गिला नहीं 
वही सिलसिला अगर 
तो फिर सिलसिला नहीं || 

हां कुछ मिटा तो है 
गम कुछ मिटा नहीं 
मेरे जख्म का अगर 
जो ईलाज मिल गया 
मेरे दर्द का मगर 
अब तक मिला नहीं || 


Thursday, March 9, 2017

अहो ! सिर्फ नारी हूँ मैं !




मनुष्य कहाँ हूँ 
पशु से भी 
कमतर 
ढकी हुई 
लाचारी हूँ मैं !

संविधान के 
लच्छेदार 
अनुच्छेदों में 
उलझी हुई 
बीमारी हूँ मैं !

धर्मग्रंथो की 
ग्रंथियों में 
कुंठित 
शापित 
महामारी हूँ मैं !

विश्वपटल के 
क्रियाकलाप पर 
नैतिकता सी 
भारी हूँ मैं !

माँ 
पत्नी 
बहन 
बेटी 
हो बटी हुई 
हिन्दू मुस्लिम में 
कटी हुई
भाषण कविता में 
रटी हुई 
भूल गयी थी 
नारी हूँ मैं !

निर्लज्ज 
पौरुष के 
लम्पट 
कपट भवन में 
दबी हुई 
चिंगारी हूँ मैं ..... 



NO
PUBLIC or PERSONAL LAW (?)
ONLY
WOMAN'S LAW 
may change the scene