Saturday, May 24, 2014

मानव का ईतिहास


मानव का ईतिहास
मानवता के ह्रास का भी
दस्तावेज है
इसे झूठ के पुलिंदो
और
अनगिनत लाशों से
छुपा दिया गया है
करोड़ो शब्दों की
सुखी घास के पीछे
जो सुलग उठती है
सच और साहस के
एक झौके से
जो
पैदा होता है
भूख और युद्ध की कोख से
जिसमे जल जाते है
काले पड़ जाते है
कई चहरे
जो पूजे जाते थे
जलसा घरों से
न्यायालयों तक ...

अगर सच ही पढ़ना है
तो
कहानी या कविता पढ़ना
वरना वक्त बिताने के लिए
ईतिहास अच्छी चीज है |



#मानव_का_ईतिहास
#historymankind

Wednesday, September 18, 2013

कही अनकही कविता हूँ मैं



समर शेष बहुत जीवन का
अभी कहा जीता हूँ मैं 
बाहर से बैचैन बहुत 
भीतर तक रीता हूँ मैं 

मौन मंथन रत एकाकी 
विकल हला पीता हूँ मैं 
एक स्वांस में मरा अभी 
एक स्वांस अभी जीता हूँ मैं 

संग्राम बीच ही रची गयी 
विस्मृत विगत रत गीता हूँ मैं 
मर्यादा की बलिवेदी पर चिर 
अर्पित मानस धर्मा सीता हूँ मैं 

लोभ बहुत है मोह बहुत 
करने कहने को अरमान बहुत 
क्या कहूँ समय बीता मुझ पर 
या विराट समय पर बीता हूँ मैं 

सहज बनावट पर नहीं सरल 
अगढ़ निपट ढिठा हूँ मैं 
पकड़ नहीं पाया खुद को 
स्व से चिपटा चीठा हूँ मैं 

क्या करू स्वयं को अनुदित 
कटु अमिय करील सा मीठा हूँ मैं 
बाहर से बैचैन बहुत 
भीतर तक रीता हूँ मैं !




Thursday, February 9, 2012

देस


जहां
मेरे नाम भी 
एक जमीन हो 
जिस पर 
चला सकूँ हल 
बो सकूँ 
सपनों के बीज 
जहां 
सावन 
तकादे ना कराये 
ना ही 
बिन  बुलाये 
बाढ़ / सूखा 
थोप दिए जाए 
जिसके बहाने 
सरकारी अमरबेल 
फिर 
पनप जाए 

मैं तो 
परदेस में 
ईटें बनाता हूँ 
सुना है 
मेरी 
गिरवी 
खपरैल पर 
नेता मुरदार 
वोट 
माँगने आये रहे 

ना 
हम नाही गए 
बटन दबाने 
और 
ऊँगली पर निसान 
अरे 
ये तो ईटा से 
कुचल गयी 
मुद्दा 
हम तो 
कब से 
"देस" गए ही नाही !


Sunday, February 5, 2012

मैं



खोजता हूँ
स्वयं को 
स्वयं ही में 
खो गया हूँ 
मैं !
कुछ और था 
कुछ देर पहले 
अब 
कोई और 
हो गया हूँ 
मैं !

Wednesday, February 1, 2012

धीरे धीरे


धीरे धीरे 
सब बदलता है 
वक्त भी 
समाज भी 
व्यक्ति भी 
साधन 
और 
साध्य भी 
मगर 
सोच ...
नहीं !
कुछ तो चाहिए 
वर्ना 
जिन्दगी 
मायनेदार ना हो जाए !


Thursday, January 19, 2012

मिटटी में खेलता बचपन



खो ना जाए मिटटी ही में 
उसे पनपने दोगे ना !
अपने भागते जीवन में 
उसे भी जगह दोगे ना !
कुचल तो नहीं दोगे ?
अंधी दौड़ में 
कोई बचपन 
गति 
अन्धविकास की
थाम कर 
कुछ क्षण 
उसे राह दोगे ना !
वो क्या देगा ?
ये ना समझ पाओगे 
अभी 
तो भी 
झंझावत में समय के 
किनारे ढूंढ़ती 
मानवी जीवन रेखा के 
संबल के खातिर ही 
अकिंचन बात मेरी 
मान लोगे ना !


Saturday, January 14, 2012

सरकारी स्कूल


राम रहीम 
सरजू बिरजू 
पोलियो वाली दुलारी 
सब 
कट्ठे ही 
रास्ता देखते है 
टीचर दीदी का 
जिसके सम्मान से 
गाव का लाला 
और सरपंच तक 
ईर्ष्या करते है
यही कही 
पढ़ाया जाता है 
पाठ 
समाजवाद का 
जिसे 
कागजो के शेर 
और कुर्सियों के कारीगर 
बदलने की कोशिश 
करते रहते है 
और हंसती रहती है 
उनकी टीचर दीदी 
नहीं टोकती उन्हें 
उनकी ऐसी 
नादानी पर !