Thursday, November 26, 2015

दादी के अचार सा खट्टा-मीठा तीखा-कडुवा : "संविधान"



जाने कैसे 
जाने क्या क्या 
मसाले डालकर 
आम का 
पुराना अचार 
जो 
डाला करती थी 
दादीयां / नानीयां

उसका 
जायका 
ज्यादा मायने रखता था 
या 
वजह बनाने की ....
 
इस पर 
बहस हो 
या 
सैकड़ो / हजारों 
तरकीबों पर ...
 
या 
इस पर कि  
सब्जी - फलों तक ही 
महदूद हो 
हद-ऐ-अचार  ...
 
या कि 
गोश्त भी / हड्डियां भी हो !
इस फेहरिश्त में ,
बकौल सेक्युलर 
खरामा खरामा 
हाजमा दुरुस्त करने को !
मर्दानगी बढ़ाने को ....!!
 
या महज 
खालिस जायके 
की खातिर ??
अचार को 
आम की पहुंच 
और समझ से 
कोसो दूर ...
 
इतना 
कसैला / बेस्वाद 
और 
लगभग बेवजह 
बनाने के 
आधुनिकतम मनसूबे देखकर ...

क्या 
आपकी आँखों में 
आंसू नहीं आते ?
 
क्या 
आपका जी भी 
उल्टियाँ करने को 
नहीं करता ...??
 
उल्टियाँ करता मुल्क 
उम्मीद से तो 
नहीं लगता...