Wednesday, April 27, 2011

करवट समय की



समय 
ऊंट सा 
चला जा रहा है 
संवेदना रहित 
निर्जन 
अमानुष 
शुष्क 
विस्तार में 
रस की 
चंद बूंदों को 
जहा 
फंदे बनाकर 
रिझाया जा रहा है ...
मृग की तृष्णा 
भ्रम नहीं है 
पर 
क्षितिज पर 
बहती 
उम्मीदों की नदी 
झूठ की लहरे
सब 
प्रपंच 
किसी और ही 
आयाम में 
रचे हैं ...
इन बिच्छुओं को 
प्यास नहीं लगती 
फिर भी 
तुम्हारा रक्त 
पीने को 
रच रहे है 
नखलिस्तान 
पर 
नखलिस्तान 
...
और 
तुम 
कहाँ पहुचोगे 
गर पार कर भी लो 
ये 
कलियुगी 
रेगिस्तान   ...


Saturday, April 23, 2011

प्रायोजित शून्य


 
शून्य से रची सृष्टि 
और 
स्वयंभू शून्य में 
अंतर 
तनिक भी नहीं 
ऐसा 
गणित कहता है 
विज्ञान का भी 
यही मत है 
पर 
क्या 
समूची रचना 
और 
अनंत ज्ञान भी 
भर पायेंगे 
इस 
प्रायोजित 
अघटित 
शून्य को ?

Tuesday, April 19, 2011

संधि पर संधि है "संधियुग"




हम चले जा रहे है 
अंधी सुरंग में 
हाथ थामे 
लड़ते 
गिरते 
कुचलते 
अपनो को 
परायों को 
जिनके पीछे

वो 
देख नहीं सकते 
अपनी नाक 
और 
निजी स्वार्थ से आगे
 
वो 
चाँद पर 
बस्तियों का 
बाजार बुनते है 

ताश में 
जोकर से हम 
बस 
एक तय 
राजा चुनते है 

संधियाँ 
उघडी पड़ी है 
नयी संधियों के तहत 
हम 
उनमे 
पुरानी संधियों के 
सुराग ढूँढते है  
  
जो 
तयशुदा ढंग से 
छुपा दिए गए है 
और 
निकाल लिए जायेंगे 
उसके द्वारा 

चौथा स्तम्भ 
अब  
श्वान बन चुका है 
अभ्यस्त
प्रशिक्षित 
अनुभवी भी 

वो 
हड्डी फैंकते है 
और ये 
दौड़ पड़ता है 

ज़रा ठहरों 
क्या उसके पीछे 
जाना जरुरी है?
 
अगर है 
तो 
संग विवेक भी 
धर लेना 
क्योंकि 
आगे 
रास्ता वही दिखाएगा 
ये श्वान तो 
तुम्हे बस 
अंधी गलियों में 
छोड़ आयेगा |
उन 
अंधी गलियों में 
बिछी है 
बारूदी सुरंगे 
जो 
अफवाह भर से 
फट पड़ेंगी 

तुम्हे फर्क पडेगा 
क्योंकि 
तुम सोचते हो 
तुम्हारा
एक घर भी तो है
 
ना उनको 
ना उनके महलों को 
नीव की 
आदत ही रही कभी 
ना ही जरुरत थी|

संधिया 
अब 
दरकने लगी है 
उनसे 
मवाद 
रिसती है 
दुर्गन्ध 
आती है 
तुम सम्भलों 
श्वान को तो 
बस 
वही 
भाती है | 

Monday, April 18, 2011

भारतीयता मौलिक ही रहेगी




या यू कहे 
कि
मौलिकता ही 
भारतीयता है 
तो 
ज्यादा सही होगा 
ज्यादा करीब होगा 

उस सच के 
जो 
छुप गया है 
दब गया है 
बाजारू सोच 
और 
हरदम बिकाऊ लोच
के पीछे 
बहुत नीचे कही 

जहा 
सोच 
और 
सिद्धांत 
सजावट भर है

नैतिकता 
सापेक्ष है 

धर्म 
चर है 

और 
आत्मा 
भौतिक वस्तु सी 
बोली पर चढ़ी है 

जिसे 
तुम प्रोफाइल कहते हो | 

Sunday, April 17, 2011

क्रान्ति जब होगी





तुम
टीवी पर 
ख़बरों में 
खुद को पाओगे 
खून से सना 

नंगी होंगी 
भूख 
हवस 
और 
उसके बीच 
बेबस 
तुम 

क्या तब भी 
सोचोगे 
इधर जाऊ 
या 
उधर ?

चुन लेना 
अपना पक्ष 
ताकत 
और 
खुले शब्दों में 
वरना 
मारे जाओगे 
अप्रत्यक्ष चयन की 
मृग मरीचिका में 

आज कौन 
अपने घर पर 
कमा 
खा 
रहा है 
फिर कौन 
कहा से 
इतनी संख्या में 
मतदान को 
आ रहा है ?
एक तो 
संविधान सुन्न है 
उसपर 
चुनाव प्रक्रिया पर 
आस्था का 
संकट 
गहरा रहा है |

रक्त रंजीत 
क्रान्ति का 
अध्याय 
लिखा जा रहा है 
मंचन का 
मंथन का 
मुहूर्त 
निकट आ रहा है |

कसम खाओ 
तब तक 
बटन नहीं दबाओगे 
जब तक 
"किसी को वोट नहीं "
और 
"मेरा वोट वापस दो"
का अधिकार 
नहीं पाओगे |

Saturday, April 16, 2011

आत्ममुग्ध राष्ट्र में संविधान की ताकत




इस संविधान को 
सैकड़ो बार 
आसानी से 
बदला गया है 
इसके 
अनुच्छेदों में 
छेद कर 
घर बना चुके है 
चूहें 
कंडीकाएं अब 
बस 
काडी भर करती है  
और 
गुदगुदाती है 
अपराधी सरपरस्तों को 
सभी खंड 
उपखंड 
खंड खंड हो 
खँडहर बना चुके है 
अपने ही 
भार में दबी 
हर इबारत को 
हर बंध 
उपबंध 
ढीला है 
समर्थों के लिए 
जिससे केवल 
फंदा बनाया जा सकता है 
मजबूरों के लिए 
वंचितों के लिए 
इसका महँगा जिल्द 
मुह चिढाता है 
फटेहालों को 
सही भी है 
इस मुल्क में 
इस एक किताब 
और 
उस एक झंडे की 
हिफाजत में 
कितने क़ानून है 
जो 
बालाओं के 
चीरहरण पर 
खामोश 
पन्ने पलटता है 
इसी किताब के 
जिनमे 
लिखे है 
पैतरे 
लाज लूट कर 
इज्जत पाने के 
झोपड़े डूबा कर 
महल बनाने के 
करोड़ो चीथड़ों को 
रुलाता 
लहरा रहा है 
शान से तिरंगा 
ऐ आत्ममुग्ध राष्ट्र !
सचमुच 
तेरी शान पर
रश्क होता है | 

Thursday, April 14, 2011

"मनमोहन" तू कोई इत्तेफाक लगता है रे



इत्तेफाक नहीं लगते एक मुझे उसके आंसू और बेबसी |
उसका दर्द , मुफलिसी  बस तुम्हे इत्तेफाक लगता है ||
तमाम दुश्वारियों का तुझसे नाता बस इत्तेफाक लगता है |
मौका ऐ वारदात , क़त्ल, और तेरा होना इत्तेफाक लगता है ||
तू बेगुनाह "मन"  उनके साथ तेरा होना अजब इत्तेफाक लगता है |
पैरवी , अगुवाई , सब जगह तेरा होना भी अब इत्तेफाक लगता है ||
इस मुल्क का होना जैसे नागवार उनको, एक इत्तेफाक लगता है |
हर आफत की पैदाइश और एक "जनपथ" फिर इत्तेफाक लगता है ||
हर इत्तेफाक से इत्तेफाक खूब ,क्या ये भी बस इत्तेफाक लगता है |
तेरा होना ना होना भी "मन", सब इत्तेफाक ही इत्तेफाक लगता है ||
"आपातकाल", "बोफोर्स", "घोटाला युग" इत्तेफकों का सिलसिला है |
मुझे तो सब बेसबब ही बस सिलसिला - ऐ- इत्तेफाक लगता है  ||


Tuesday, April 12, 2011

राष्ट्र देवो भव:




ये ध्वज 
ये भूमि 
सब अपने 
इस राष्ट्र देव में 
समाहित है 
जाती से 
वर्णों से 
ऊपर 
कहीं 
सब धर्मों को 
समेटे 
एक आँगन में 
धूप छाव सा 
शहर गाँव सा 
राष्ट्र देव 
लेता है 
केवल भाव 
अर्पण करो 
वही से 
जहां 
जब 
जैसे 
तुम हो |
राष्ट्र है |
एक है |
सबल भी है |
बस
आस्था भर 
पवित्रता चाहिए 
देखो ..
वो राष्ट्र देव 
जगता है |
जगाता है |
जंतर मंतर पर 
कोई संत 
एकता का 
सूत कातता है 
अनुशासन का 
चरखा चलाता है 
स्वाभिमान से जीना 
सिखाता है |

Saturday, April 9, 2011

अब मौन मत धर लेना भारत !



जीते नहीं
अभी बस
जागे है ,
मरे नहीं है
सब मच्छर
बस भागे है |
क्रांति
कोई खेल नहीं
कि
हसते हसते
वक्त कटे
ये मौन
बतलायेगा
अब
कौन कटे ,
कौन हटे
कौन बटे
रहे अंत तक
कौन डटे |

Thursday, April 7, 2011

भागो अन्ना आता है !




भूखे पेट
सोये देश की
खोखली
बंजर
जमीन के नीचे
चूहों ने
बिल बनाये थे
कुछ तो
यही पैदा हुवे
कुछ
बाहर से
आये थे |
खाकर
दाना पानी
अब
बीज पर
नजर थी |
इसकी
अन्ना को
फिकर थी |
वो जाग रहा था
जगा रहा था
टूटा चरखा
चला रहा था
जो
दरअसल
गांधी के
रथ का पहिया था |
जिसमे
सुराज की
धुन बाकी थी
जिसने
अपनी धोती
फाड़ कर
अबला भारत की
इज्जत ढ|की थी |
उस सूत में
अभी भी
जान बाकी थी |
वो उठा
उसने शंख बजाया था
मरी भारतीयता को
संजीवनी मन्त्र
सुंघाया था |
आज वो ही
अन्ना
जंतर मंतर पर
अड़ा है
जाने किस दम पर
खडा है |
मगर
चूहों की सरकार में
मची खलबली है
दिल्ली में
अजब सी
चलाचली है
जिसे देखो
मैदान छोड़
भाग जाना चाहता है
एक ही शोर है
भागो चूहों भागो !
कि अन्ना आता है !

Monday, April 4, 2011

शर्म करो इंडिया शर्म करो !!!


क्रिकेट कभी अपनी जिन्दादिली और जांबाजी के लिए जाना जाता था , बदलते नियमों ने जहां तेज गेंदबाजी को मलिंगा जैसे चकर के हाथ पहुंचा दिया वहीँ इस खेल की सर्वोच्च संस्था मुरली जैसे चकर को विश्व रिकार्ड बनाने के लिए आधारभूत नियम तक बदल डालती है |अगर गेंदबाजी कि वह धार कायम रहने दी जाती तो कई भगवानो को आइना देखना पड़ता मगर जिस तरह नियमों का बहाना बना कर भारतीय हाकी को कुचला गया , उसी तरह WESTENDISE जैसे देश में खेल को बोथरा करने के सारे प्रयास किये गए और इसी संस्करण में २०-२० का बच्चों वाला क्रिकेट लाकर पहले ही इस खेल के चाहने वाले (समझने वाले ) दिलों को कब का तोड़ा जा चुका है | अब तो ये एक मंडी है जिसमे सब बिकता है और इस मंडी के दलाल कौन है सब जानते है |

आज बदल चुके परिवेश और प्राथमिकताओं के दौर में पिछड़ चुके भर्स्ट देश के लिए २८ वर्ष के बाद मिला यह कप किसी दकियानूसी परिवार में , बुढापे में जन्मे बालक , जैसा है |इस पर मिल रही प्रतिक्रियाये तो हमारे नितांत खाप समाजी सोच को ही बताती है | जिस खेल ने राष्ट्रीय खेल सहित सभी प्रतिभाओं को साबुत निगल लिया हो उसके अति दीवानगी दिखाती भीड़ में वो पालक भी होंगे जिनके नौनिहाल कई क्षेत्रों में देश का नाम रौशन कर सकते होंगे और हम ऐसा चरित्र दिखाए भी क्यों ना , आखिर गर्व करने के लिए , बलात्कारी भ्रष्ट और गरीब देश के पास यही तो उपलब्धि है |

ग़ालिब चचा का शेर याद आता है "हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है। "

भारत जैसा देश जिसकी ना मालुम कितनी जनसंख्या , खिलौना बन चुकी गरीबी रेखा के नीचे सड कर मरने के लिए मजबूर कर दी गयी है | जो देश शिक्षा तक का विनिवेश करने पर उतारू है | उस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी नेता , जिनमे देश के सर्वोच्च आसनों पर विराजित महानुभाव भी है , आज सभी मेहनत से कमाई देश कि पूजी खेल तमाशों पर लुटाने को बैचैन दिखते है | ये इस देश के लिए घोर शर्म और निराशा का विषय है की इसने तुच्छ स्वार्थी घरानों और प्रतिष्ठानों का हित साधने के लिए अपना विवेक भी घिनौने शो बाजार के बिस्तर पर चढ़ा दिया है |
जनता वही स्वांग रचती है जिसको महामना अपनाते है तो किस मुह से हम अपनी अगली पीढ़ी को मानवता के पाठ पढ़ा कर ये अपेक्षा रख पायेंगे की वो देश कि सदियों पुरानी साख को बढाए ना सही बरकरार ही रख सके | इस जूनून को देख कर तो भविष्य गर्त में जाता दिखता है |

शर्म करो इंडिया शर्म करो !!!