Thursday, August 26, 2010

हे माँ हिंदी भावभरी !

हिंदी का मान हम है
हिंद का मान है हिंदी
इतनी सी आस और है
विश्वभाल दमके ये बिंदी

अपनी भाषा अपना गौरव
जाने कब के भूले तुम हम
गैरों को पग पग पे नवाजा
अपना मजहब भूले तुम हम

कैसे हिन्दी का परचम लहरे
कैसे साथ साथ तिरंगा फहरे
हिंदी की सीढ़ी पर कितने पहरे
अलगाव तुष्टि के घाव है गहरे

इसमे ही बसा भारी जनाधार
कितनो की कश्ती का पार
आज मातु है स्वयं मझधार
कहने को जन गण भले अपार

धिक्कार करो इस जीवन पर
यदि निज भाषा का मान ना हो
अधिकार करो उस सत्ता पर
जिसे निज गौरव का भान ना हो

सजीव शब्दों का संधान करो
निज भाषा का अनुसंधान करो
फिर धरो प्रत्यंचा भावो की
सब सुलभ लोभ का दान करो

हो कर्मवीर तुम हो रणधीर
क्यों काँधे को झुला रहे
क्यों शिथिल हुई तनी भवे
क्यों भविष्य को रुला रहे

निज घर से निज आँगन से
तुम माता का आह्वान करो
हे मातृभाषा ! हे भावभरी !
आओ ! हो प्रगट, हिंद उद्धार करो !

दुश्मन तेरा शुक्रिया !

आज बहुत दिनों बाद
फिर चेतना लौटी है
मैं भी लौटा हू
चेतना में

बेसुध
बहुत लड़ा
अँधेरे की बंदिशों से
विश्वास
और
श्रद्धा की खडग भी
छूटने लगी थी..

तभी
इश्वर स्वयं
खडग बन
ढाल बन
खड़े हो गए
जीत हार का
अब मै क्या करू...

दे रहा हू दुवाए
दुश्मनों को
के
उन्हीने ही सही
ईश्वर का
दीदार तो करा दिया !

Monday, August 23, 2010

जीवन की पाठशाला में

क्रोध की सीमा
और
मर्यादाओं के भंग तक
रोज तमाशों से
गुजरता हु
भोगता हूँ
अपने ही
उपेक्षित व्यवहार से
उपजी वित्रश्ना
और
दुर्व्यवहार को |

सीखता हू
सोचता हू
और कितना
कब तक
सीखना
सहना
बाकी है
जीवन की पाठशाला में |

Monday, August 16, 2010

१६ अगस्त मनाओ

१६ अगस्त मनाओ

आज थोड़ा सड़को पर निकल जाओ
जहा से कल हुजूम निकला था
तथाकथित देशभक्तों का
सड़क के किनारे पड़े ,
नाली में
झंडे उठाओ (अगर कर सको )
फिर देखो
उस मैदान की तरफ
जहां
कल सभा हुई थी आम
जिसमे ख़ास लोग आये थे
उस मैदान में
कल तक
बच्चे
फूटबाल खेला करते थे
अब
पूरा मैदान गड्ढों से भरा है
भीतर कीचड़ और कचरा भरा है
देखो
सफ़ेद खादी पहने
जो गुंडा
कल
झंडे का सरेआम
अपमान कर रहा था
आज वसूली कर रहा है
पुलिसवाला
जिसकी कमाई
कल मारी गयी थी
ड्यूटी और खातिरदारी में
जिसकी भूक और नींद भी गयी थी
आज फिर
चुस्ती से चौराहे पर अडा है
लाल बत्ती पर
पहरा कडा है
आज
भले कही बम फूटे
चाहे
कोई घर लूटे
इनसे आस मत रखना
मगर
भीतर
कही भारत को ढूँढना
पोछना
सम्हाल कर रख देना
क्योकि
बीते कल
बहुत अपमान हुवा है
मेरे भारत का
लालकिले से चौराहे तक
(शहीदों और सुभाष की दुखती आत्मा को श्रद्धांजलि सहित..जय हिंद !)

Sunday, August 15, 2010

आज

आज सिर्फ उनको नमन करो
आज बस उनकी बात करो
आज शिकायते ना करो
आंसू भी ना बहाओ
दो फूल श्रद्धा के
हाथों में उठाओं
उस ध्वज पर चढाओ
जो छत्र बन तना है
जो
लोकतंत्र का प्रहरी बना है
आज
उनको मत कोसो
जो
हमें धकेलने में लगे है
पीछे
आज
उनको नमन करो
दो फूल
कृतज्ञता के
उन्हें भी चढाओ
जिन्होंने
शीश अपने
अर्पण किये है
जिन्होंने
बलिदान कितने दिए है
आज
आपनी समस्याओं पर
शोक मत मनाओ
आज
विडम्बनाओ को
वर्जनाओं को
भूल जाओ
दो फूल
उन्हें भेट करना
जो
असत्य से लड़े है
जो
संविधान के
पक्ष में खड़े है !

ओ भारत माता !!

रोज सवेरे पूरब तेरे
सूरज नमन को आता
तू है मेरी जन्म भूमि माँ
तू हम सब की माता
मेरी भारत माता , ओ मेरी भारत माता !
भारत माता , ओ भारत माता !!

हम करे वन्दना तेरी
जग तुझको शीश नवाता
हम करे प्रार्थना तेरी
जीवन की राह अँधेरी
जो आशीष तेरा मिल जाता
पथ में प्रभात हो जाता
ओ भारत माता, ओ भारत माता!!

यहाँ जग में विशाल हिमाला ,
जिसने गंग जमन को पाला
इसकी मिटटी में सोना
इसमे मिल कर ही खोना
जो गोद तेरी सो जाता
मुझे स्वर्ग यही मिल जाता
ओ भारत माता, ओ भारत माता!!

यही रची स्रष्टि की गाथा
कहे उन्नत कर कर माथा
तेरा ध्वज इतिहास उठाता
हर पग भविष्य को जाता
तू वेद संस्कृति दाता
तेरा पुत्र जगत का भ्राता
ओ भारत माता, ओ भारत माता!

(अपने लड़कपन में लिखी ये रचना आज सब से बाटते हुवे बहुत हर्ष हो रहा है ! सभी मित्रों , शुभचिंतकों व स्नेहीजनो को भारत वर्ष के स्वंत्रता दिवस पर्व की हार्दिक हार्दिक बधैया ! इश्वर हमें सन्मार्ग पर आगे बढाए यही कामना करता हु ...शुभम अस्तु !)
तरुण कुमार मोहन सिंह ठाकुर
इंदौर से

Thursday, August 12, 2010

जब तुम घर नहीं होती

मेरा मन भी बैचैन रहता है
अस्थिर भटकता हूँ
जगत में
मन के सुने वन में
अजीब से
ख्यालों से
जूझता हुवा
इन्तेजार करता हु प्रिये!
के कब
तुम्हे लौटा लाऊ
अब तो
बच्चो की याद भी
बहुत आती है
और
उनकी छुट्टिया भी
ख़त्म होने को है
सोचता हु
इस इतवार
किसी बहाने
तुम्हे लिवा लाऊ
मगर
कुछ मजबुरिया है
अब
तुमसे क्या छुपा है
गर्मियों के ये
अंतिम सप्ताह
यानी पानी की किल्लत
तुम यहाँ होती
तो हम तुम रातों को
जाग रहे होते
दो घड़े पीने के पानी के लिए
और
तुम हलकान रहती घर पर
गर्मी के मारे |
बड़का तो चलो
अब गर्मी सह लेता है
मगर छुटकी
उसे कैसे सुलाती तुम
फिर
इस विकराल समस्या
के अलावा
कई बड़ी छोटी
समस्याए है |
खडी बैठी
के एक एक कर
हल कर तो रहा हूँ
मगर
कभी चादर छोटी पड़ जाती है
कभी समस्या फ़ैल जाती है
इन्हें समेटने सहेजने और सुलझाने में
पूरा दिन
उलझता हूँ
फिर
रसोई में भी लगता हु
कच्ची पक्की खाकर
गुजारा कर रहा हु
समझ ही नहीं आता
जी रहा हूँ
या मर रहा हु
हां पर
इन्तेजार कर रहा हु
तुम बस
पहली खबर पाते ही
बिस्तरा बाँध लेना
मैं अगली गाडी से
पहुच जाउंगा
इस रविवार डार्लिंग
तुम्हे
जरुर लिवा लाऊंगा |

Tuesday, August 3, 2010

वो....शिखर !

जब मैंने
पहाड़ पर चढ़ने के लिए
सीढिया बनाना
शुरू ही की थी
उन्हें लगा
मुझे
मदद चाहिए होगी
फिर
वो
मेरी जिंदगी में आयी
कई वादों
और
नेक इरादे के साथ
मगर
उसका काम
आसान भी था
मुश्किल भी
आसान यू
के उसे नीचे ही रहना था
ऐसी कोई
शर्त तो नहीं थी
मगर
यही था
जो उसके लिए
सबसे आसान
और
सहज स्वीकार्य होता
ऐसा मान भी लिया गया
उसे
अपना नया काम
बहुत भाया
उसने
बड़ा जी लगाया
मैं
रोज ऊपर जाता
नयी सीढिया
तराशता
अपने लिए
अपनो के लिए
मैं
रोज रात
नीचे लौटता
जब
अन्धेरा हो जाता
सुबह तक
सोया रहता
जुल्फों की
घनी छाव में
चाँद को
देखते हुवे
जो
बहुत हँसीं हुवा करता था
बेशक
उन दिनों
सुबह
मेरा जी तो नहीं चाहता
मगर
वक़्त की धूप
मुझे
कोड़े मार मार कर जगाती
भेजती
ऊपर
जहा
कल
मैं अपना काम
बाकी छोड़ आया था

आज
कई मंजिलो ऊपर
रोज
चढ़ना उतरना
हो नहीं पाता
थक जाता हूँ
वो भी
अब परेशान रहती है
जुल्फों की छाव भी
अब
कम घनी हो रही है
चाँद
मुरझाने लगा है
मेरे
अपने
जो
चढ़ सकेंगे
शिखर पर
मेरे बाद
कही आराम से
उसे सताने लगे है
वो चाहती है
मैं उसे भी
साथ ले चलू
गोद में उठाकर
या
नया शिखर रचू
उसे साथ लेकर
मैं
अनिश्चय में
कभी
उसे
कभी
शिखर को देखता हूँ
जहा
बस
कुछ सीढियों
का फासला बाकी है
फिर
महसूस करता हूँ
उसके
और
मेरे दरम्यान
दुरी बढ़ती जा रही है
शिखर
नजदीक आता जा रहा है
वो
दूर होती जा रही है !