Saturday, December 31, 2011

विदा हो कोलाहल के बरस



मर चुके चौराहे पर 
ज़िंदा होती उम्मीद 
आशा के निनाद 
और जन कलरव के बरस 
तुम 
उम्मीद दे गए 
तरसती आँखों को 
सपना 
बरसती बूंदों का सावन 
वादा मनभावन दे गए
मथा मानस    
बंधा ढाढस
अबूझा दर्द दे गए 
ले गए कुछ तमस 
अभाव कुछ बढ़ा भी गए 
प्रश्न 
सुलझे नहीं तमाम 
उलझने 
कुछ बढ़ा भी गए 
भूखे की भूख 
गरीबी को महंगाई 
व्यापार में खटाई 
विचार में गहराई 
व्यवहार में उतराई सा 
गत बरस 
बहुत... धीरे बीता 
खैर 
बीत ही गया
ना हारा 
ना जीत ही गया
अजब और असमंजस का 
बीता बरस 
शोर सा लगता है 
नवयुग में शुचिता का आग्रह 
अलसभोर सा लगता है |

जाओ बीते बरस 
ईतिहास की पनाह में 
और कई बीते बरस है 
अभी तुम्हारी राह में 
उनका हिसाब अभी बाकी है 
बस 
तभी तक तुम्हारी झांकी है 
ये तो तय करेगा समय 
कि 
ईतिहास ने किस बरस की 
कितनी कीमत आंकी है 

विदा ! 



Friday, July 29, 2011

अनाम वेदनाओं के शिलालेख




भूख और बीमारी 
बलात्कार और हत्याएं 
घुमाते है 
वक्त का पहियाँ 
जो 
रक्त और मांस से 
बोझिल हो चला है ...

इन सब से बेखबर 
दो वक्त डकारता 
कोई 
बदलता है चैनल 
पलटता है पन्ने 
करता है चुगली 
रहता है मौन 

मौत नहीं बख्शती 
ना भीष्म को 
ना ही विदुर को 
तुम बन भी जाओ 
अश्वत्थामा या कृपाचार्य
आ न सकोगे फिर  
सम्मुख
किसी द्रोपदी के 
भले उसे गुजरे 
बीत जाएँ 
सदियाँ , सहस्राब्दियाँ भी |

लो फिर किसी 
राम ने 
तोड़ा है शिव धनु 
या फिर 
ये लाखों गांडीवों की 
दुर्भेद्य ध्वनि है 
लगता है 
धरती फटने को है 
श्वानासन धसने को है |

तुम मत उठों 
बाहर बहुत ठिठुरन है 
तुम 
मजबूरियों की 
चादर ओढ़े 
इन्तेजार करो 
अभी क्रांतिवीरों के लहू सींचा 
स्वाभिमान का लाल सूरज 
उगेगा पूरब से 
हो सके तो 
उसे जल चढ़ाकर 
प्रणाम भर कर लेना 
तुम ही कृतार्थ होवोगे 
वो तो रोज दमकेगा 
अभी वो 
हमारे दिलों में 
आजादी की तड़प बन 
धड़कता है 
अभी वो 
हमारी कोख में 
कल की आस बन 
सुलगता है |

चलते चलते 
लिख दू ये भी 
कि हाँ 
मैं भी 
तुम्हारी तरह 
बहुत बैचैन हूँ 
पर तुम मौन हो रहना 
सदा की तरह|

ये कोई रात है 
सोये तो कैसे 
बाहर हर तरफ 
कोई चिल्लाता है 
"जागते रहो "|
कोई इन्हें चुप करो 
हमें आदत है 
झींगुरों की 
उल्लुओं की 
चमगादड़ों की |

कोई 
कब्र खोदता है 
अँधेरे की 
गाड़ता है 
समय की निशानी 
एक शिलालेख 
जिस पर 
बना है कोई चिन्ह 
और नीचे लिखा है 
"मुझे वोट दो ... "

सौ बरसनुमा 
कई सदियों के बाद 
खुदती है कब्रें 
निकलते है पत्थर 
जो 
शर्म से 
पिघलने लगे है 
नजर भर पड़ने से 
दरकने लगे है |

करोडो जिस्म जब 
राख हो चुके हों 
ख़ाक हो चुके हों 
तब कौन ईतिहास बचता है 
कोई बहुत ऊपर 
लगातार 
एक दुनिया मिटा कर 
नए अध्याय रचता है 

समय भी 
संकल्पना मात्र है 
जिस अबूझ अतल पर 
जहां मिलती है 
शीतलता जल कर 
वहाँ प्रपंच क्या करेगा ?
समय से परे 
वो सूत्रधार 
क्या कविता रचेगा ,
हँसेगा या 
अट्टहास करेगा ?

कवि ही पड़ते है 
ऐसे पचड़ो में 
छोडो ये बत्गुईया 
तुमने सुना 
दिल्ली ने 
कल फिर दाम बढाए है 
ज्योतिष कहता है 
अबकी मानसून अच्छा होगा 
चल 
आज मैं चाय पिलाता हूँ |
राम राम भैया !
अन्ना कैसे है ?
गुज़र गए !
....
अच्छे आदमी थे |

Friday, July 1, 2011

काल यात्री का अपहरण























वह सफल हुवा 
मन्त्र से 
यंत्र तक 
उसका स्वप्न 
अब उड़ान पर था 
वह 
ईतिहास की 
अनदेखी 
उलझी हुई 
ढलान पर था 
उसका यान 
ईतिहासकारों  के 
रक्खे 
प्रपंच से 
जा टकराया था 
वह 
अधूरे पथ में 
काल यान से 
बाहर 
निकल आया था 
वहा 
पढ़े हुवे 
अजनबी चेहरों में 
कुछ ने 
नकाब ओढ़े थे 
कुछ 
मुखौटे लगाए थे 
अजनबी यात्री को 
अपहरण कर 
डाल दिया गया था 
मध्युगीन 
सामंती 
कैदखाने में 
जहां 
मिले थे उसे 
शिल्पी 
शायर 
और 
वीर 
जिनका 
अनुभव 
कौशल 
और 
कारनामे 
छीन कर 
सौप दिए गए थे 
उन्हें 
जिनका नाम 
उसने 
पढ़ा था 
सरकारी 
पुरस्कृत 
प्रायोजित 
किताबों में 
ये बात ईतर है 
कि
वो किताबे 
बहुत महँगी 
नहीं थी 
फिर भी 
उसने 
रद्दी ही से खरीदी थी ...
वह कसमसा रहा था 
आजाद होकर 
चुरा ले जाना चाहता था 
चंद चहरे 
कहानीयाँ 
दस्तावेज 
ताकि 
उसका बच्चा  
जान सके 
ईतिहास के पन्नो के 
काले झूठ को 
और 
पढ़ पाए 
गुण पाए 
बुन पाए 
कुछ 
अनाम
असंदर्भित 
मौन अवदान ...
अनलिखी 
मिटा दी गयी 
विस्मृत पंक्तियों 
और 
उनके बीच कहीं 
कही बहुत गहरे 
हाशियों पर शायद 
उसने 
छुपा दी थी 
बहुत चतुराई से ...
दोहों 
लोकगीतों 
कहावतों 
और 
लोक कथाओं के 
अबूझ रूप में ...
जिन्हें 
आज फिर 
नकार दिया जाएगा 
ऐसे या वैसे  
क्या फर्क पड़ता है 
तुम्हे / मुझे 
सच ही तो है 
सुन बे "कबीर" 
व्यग्र , आतुर , स्वचलित 
इस पंच सितारा 
संस्कृति(?) में 
तू 
पैबंद सा लगता है रे |
-- 

Wednesday, June 8, 2011

अथ भ्रष्टासुर वध कथा - भाग ३


क्रमश: भाग   से  आगे 
ना दिल्ली ही नयी थी 
ना जनदेव दिल्ली में नए थे 
पर पतिता राजनीति के 
पैतरे हर पग नए थे 
बहुत पहले 
छल से 
संविधान ले लिया था 
दिल्ली ने ठग कर 
वो दिल्ली 
अब देश को 
ठेंगा दिखाती थी 
लावारिस क्रांतिकारियों की
लाशें बेच खाती थी 
वही कुछ 
मर चुके मानवी शरीरों में 
भुस भर 
बैठा दिया था 
राज भवनों में 
जो अन्यथा 
मिटा दिए जाने थे 
गुलामी के प्रतिको से 
वहीँ 
जंतर मंतर पर 
और गांधी की समाधि पर
वैसे तो गांधी ज़िंदा था 
मगर रोज मार दिया जाता था  
किसी नोट पर 
छाप दिया जाता था 
बैठ गए जन देव 
चौराहे पर 
और जनता 
जो चमत्कारों से जगती थी 
उमड़ आई हजारों में 
माध्यम भी थे खड़े 
इन कतारों में 
जन देव प्रसन्न थे 
आत्ममुग्ध 
भूल बैठे 
दिल्ली तो ठगों की
आदिम नगरी है 
अमृत छलकाती जिव्हा से 
विष की गगरी है 
दिया गया 
अश्वासनी प्याला 
मुहरबंद राजपत्रों पर 
जनदेव चौके तो थे 
पर जानते थे 
कोई छल अवश्य ही 
है नहीं तो होगा 
मगर वो जानते थे 
उसका परिणाम क्या होगा 
बली जब छल से 
जीत जाता है 
समझो 
अपने विनाश का 
बीज बोता है 
आगे फिर 
वही हुवा 
जो 
हर युग में 
हर महाभारत में 
हुवा है सदा ही 
होता है 
क्योंकि 
भक्तों !
हर दिल्ली के बगल में
अवश्य ही  
एक कुरुक्षेत्र होता है |

सो जनदेव लगे थे सत्ता के लोभ समुद्र को मनाने में पर लगता नहीं कि सेतुबंध के सिवा कोई और राह रही थी , मैं आगे कैसे कहू समय ने भी मुझसे इतनी ही कथा जो कही थी ... तो विश्वास रखे भक्तों , बोलिए जय जय जनदेव !


Tuesday, June 7, 2011

मिथक को पोसते हम इंडियन



ना एक अद्वितीय नाम ही 
दे पाए विश्व को 
उसने कहा इंडियन 
और हम 
इंडियन हो गए 
कुछ नाखुदा सरफिरे 
आधी रात को 
बैठे और जमीन बाट आये 
बोले 
यही आजादी है 
विभाजन की  पीड़ा 
महाजनी सूद 
शिक्षा के अकाल 
महामारियों की बाढ़ में 
बहता कोई जन समूह 
जा पहुहा लालकिले 
रेडियो पर 
तुरही बजा दी गयी 
क्यों ?
कभी दिल्ली 
बन जाती है 
राजधानी 
कभी 
दिल
कभी एक राज्य 
क्यों ??
नहीं मिलती
दक्खिन या पूरब को 
केन्द्रीय भूमिकाएं 
मैं कहता हूँ 
तुम कब नकारोगे 
इस कागजी देश को 
जिसे दुनिया ने 
ताश के जोकर की तरह 
कब का छाट रक्खा है 
क्या अब भी 
रीढ़ हीन कापुरुषों को 
पिछलग्गू नारियों को 
संसद नाम के 
अभिजात्य क्लब भेजने 
किसी उजड़ी सरकारी स्कुल में 
बिकी हवी पुलिसिया हुकूमत से 
डंडे खाकर बेइज्जत होकर 
वोट डालने जाओगे 
अगर अब भी 
थोड़ी आत्मा 
और 
स्वतन्त्रता की  ललक 
बची हो 
तो 
अगली ही सांस पर 
नकार देना 
ऐसे खोखले प्रजातंत्र 
और 
दम्भी संविधान को 
जो भीड़ देख कर 
स्वागत नहीं करता 
हग देता है  |
 


Monday, June 6, 2011

अर्धसत्य की लाश सा अधमरा लोक(?)तंत्र



भरे पेट गाल बजाता 
भोग में डूबा है 
भीड़ तंत्र 

आबरू बेचता 
मां  बहनों की 
दलाली खाता हुवा 
बेशर्म तंत्र 

खून पीता 
भूखी आंतो को 
परोसता हुवा 
भेड़िया(गीदड़) तंत्र 

मर चुकी आस्था से 
मृत शरीरो को 
भोगता भभोड़ता 
नीच तंत्र 

खबरे पढ़ता 
खबरे गढ़ता 
बहाने खोजता 
कोसता 
अपने खोल में 
खूब गरजता है 
कछुवे सा
भीत तंत्र |



Thursday, May 19, 2011

अथ भ्रष्टासुर वध कथा - भाग २



क्रमश: भाग १  से  आगे  



जनदेव के लिए
समाधि के 
वह छ: दशक 
यू ही बीत गए 
सोते संबल के 
सब क्षण में रित गए 
जैसे दूध फट जाता है 
गिरते ही अम्ल की बूंद 
बहुत विकल्प 
तलाशते / तराशते 
जनदेव अब 
बुढ़ाते से लगने लगे 
उनकी चिर यौवना सखी 
सौन्दर्य स्वामिनी 
सत्ता तब प्रकट हुई 
समस्त वैभव 
और पूर्ण प्रभाव के साथ 
आलोकित हो उठे 
जन गण मन प्रफुल्लित 
तब 
मंद स्मित से 
बोली वह 
हे प्राणाधार 
आपको नहीं देख पाती हूँ 
यू विवश व्याकुल अधीर 
क्यों सूखा जा रहा 
प्रभु के मुख का नीर 
यू शुष्क गात 
पिचके कपोलो को 
अब सह ना पाउंगी 
स्वामी , व्रहद्द जग को 
क्या मुह दिखाऊंगी 
जब की सत्ता ने बहुत चिरौरी 
कुछ अस्फुट सा बोले 
पहली बार जनदेव 
"दिल्ली चलो " देवी 
दिल्ली चलो ...

देखिये अब दिल्ली में क्या कुछ हुवा सो तो जनदेव जाने ,लगी हुई है  सत्ता उन्हें दिल्ली भिजवाने सो तब तक भक्तों धीरज धरो और बोलो जय जय जनदेव ! दिल्ली चलो जनदेव ! दिल्ली चलो जनदेव !

आगे ...



Wednesday, May 18, 2011

अथ भ्रष्टासुर वध कथा भाग १

  

सोये थे जनदेव 
भोगनिन्द्रा में
तन्मय हो 
लिप्त थे 
नित्य क्रीडा में 
तभी 
भ्रष्टासुर आ धमाका 
ठीक सिर पर 
प्रभु जागे नहीं
उनींदे ही 
पूछ बैठे 
कौन वत्स भ्रष्टासुर ...
तुम तो हो गये हो
दुराचारी 
और 
दुर्घर्ष भी 
समाचार सब 
नारद जी 
फैला रहे है 
तमाम माध्यमो पर 
नित ही तुम 
तोड़ते हो 
स्वयं ही के कीर्तिमान 
याद नहीं पड़ता 
कैसे !
कब !!
उद्भव हूवा 
सो कथा तुम ही कहो 
मेरी ओर से नि:शंक रहो ...
प्रभो , बोला भ्रष्टासुर 
परिचित 
विनीत स्वर में 
आपकी ही 
उपेक्षाओं से जन्मा हूँ 
अवसरवादिता 
और 
सुविधावृत्ति ने 
पालन किया 
मां  लक्ष्मी की 
रही कृपा बरस 
आपसे क्या छिपा भगवन 
बढ़ रहा हूँ 
कलिकाल की 
अनुकूलता में 
पल पल हर क्षण 
क्षुधा से 
आकुल हो 
इस द्वार आया हूँ 
आप ही शेष रहे  
शेष सबको तो खा आया हूँ !
अब कुछ 
तंद्रा में विध्न पडा 
तो विचलित हो 
बोले जनदेव 
मुर्ख 
जानता नहीं 
मेरी ताकत 
मेरी सहमति 
और मौन से ही 
रहते है 
भ्रष्ट सारे सत्तासीन 
दीर्घायु अभामंडित सदा 
मेरे अन्दोलनास्त्र की 
एक फूंक से 
ध्वस्त कर सकता हूँ 
तुझ जैसे सहस्रों को 
तेरे लिए तो 
मेरा शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही 
पर्याप्त है 
अट्हास से भ्रष्टासुर  की 
दहल उठा था नभमंडल तब 
जनदेव, भले आप पूज्य हो 
और समर्थ भी 
भेद ना सकेंगे 
मेरे संगठित 
बेशर्मपुर गढ़ को 
और 
मेरे लिए तो 
आप ही ने  दिया था 
संविधान का कवच 
भूल गए प्रभु !!!
ओह , बड़ी भूल हुई 
जनदेव अब भी 
मूर्तिवत सोच रहे है 
क्या पता 
समाधि में है 
या भ्रष्टासुर  ने 
बना दिया 
उन्हें भी जड़ ...

कथा अभी शेष है , कृपया प्रतीक्षा करे , जय जय जनदेव !
आगे ...

Sunday, May 15, 2011

उसमे वो आग अभी बाकी है



खबरे पढ़ कर 
जी करता है 
अखबार जला दू 
ख़ुदकुशी कर लू 
गोली ही मार दू 
समाज के नासूरों को 
फिर 
कुछ सोच कर 
रोता हूँ
हँसता हूँ 
मन बदल लेता हूँ 
दर्शन की आड़ ले लेता हूँ 
खुद को 
बहलाता हूँ 
औरों को 
समझाता हूँ 
बस 
बहस नहीं कर पाता 
किसी युवा से 
क्योंकि 
अगर उसने ठान ली 
तो मैं जानता हूँ 
सब बदल डालेगा 
होम हो जाएगा 
बदलाव के हवन में 
मैं जानता हूँ 
क्योंकि 
मैं भी 
कभी 
ऐसा ही हुवा करता था  
टटोलता हूँ 
भीतर 
कही वो आग 
शायद अब भी बाकी हो ...
-- 

Thursday, May 12, 2011

अदद एक ईमानदार रचना के लिए



प्रयास रत हूँ मैं 
जूझ रहा हूँ 
स्वयं से 
अपनो से 
परायों से 
व्यवस्था से 
कि 
लिख सकू 
चिर प्रतीक्षित 
ईमानदार रचना 
जिसमे 
उघाड़ दूँ 
स्वयं और समाज को 
मर्यादित ही 
अनावृत्त कर दू 
मानवीय संवेदना के 
आदि स्रोत 
और 
उसके प्रयोजन को 
निहितार्थ को  
परिणिति को 
सरल 
सहज शब्दों 
और 
शुद्ध 
आडम्बरहीन
रचना द्वारा 
गाई भले ना जा सके 
पचाई जा सके 
ऐसी 
सर्वकालिक 
मौलिक रचना का 
आपकी तरह 
मुझे भी 
इन्तेजार है  ...

Thursday, May 5, 2011

कठिन है मुसलमां होना




रोज
खबरों पर 
मिडिया में 
खुद को
देखते 
पढ़ते 
सुनते 
समझ 
बौराने लगी है  
एक मेरे सिवा 
सब को 
फ़िक्र है 
मेरी नहीं 
मेरे मजहब 
और 
उस पर चिपके 
पैबंद की 
मैं भी 
"जिहाद "
चाहता हूँ 
जहालत 
गरीबी से
निजात चाहता हूँ 
मगर 
लगता है 
आसान है 
ऐसे ही 
खबरी मौत 
रोज मरना 
सचमुच 
बहुत 
कठिन है 
जीना 
जी कर 
मुसलमा होना ...

इस्लाम 
एक पिंजरा है 
जो 
उड़ना चाहता है 
और 
बंद भी रहना 
भीतर से !!!

Tuesday, May 3, 2011

वादा रहा जिंदगी !



बहुत बैचैन हूँ 
बेसब्र हूँ 
कुछ कह ना बैठूं 
कर ना जाऊं 
ऐसा 
कि 
पछताना पड़े 
मुझे 
और 
मेरे अपनो को 
बहुत अरमां 
संजोये है 
जिंदगी 
तेरे साथ 
तू रहे 
आबाद रहे 
तो 
तेरे साथ 
बहुत 
दूर का 
वादा रहा... |

Wednesday, April 27, 2011

करवट समय की



समय 
ऊंट सा 
चला जा रहा है 
संवेदना रहित 
निर्जन 
अमानुष 
शुष्क 
विस्तार में 
रस की 
चंद बूंदों को 
जहा 
फंदे बनाकर 
रिझाया जा रहा है ...
मृग की तृष्णा 
भ्रम नहीं है 
पर 
क्षितिज पर 
बहती 
उम्मीदों की नदी 
झूठ की लहरे
सब 
प्रपंच 
किसी और ही 
आयाम में 
रचे हैं ...
इन बिच्छुओं को 
प्यास नहीं लगती 
फिर भी 
तुम्हारा रक्त 
पीने को 
रच रहे है 
नखलिस्तान 
पर 
नखलिस्तान 
...
और 
तुम 
कहाँ पहुचोगे 
गर पार कर भी लो 
ये 
कलियुगी 
रेगिस्तान   ...


Tuesday, April 19, 2011

संधि पर संधि है "संधियुग"




हम चले जा रहे है 
अंधी सुरंग में 
हाथ थामे 
लड़ते 
गिरते 
कुचलते 
अपनो को 
परायों को 
जिनके पीछे

वो 
देख नहीं सकते 
अपनी नाक 
और 
निजी स्वार्थ से आगे
 
वो 
चाँद पर 
बस्तियों का 
बाजार बुनते है 

ताश में 
जोकर से हम 
बस 
एक तय 
राजा चुनते है 

संधियाँ 
उघडी पड़ी है 
नयी संधियों के तहत 
हम 
उनमे 
पुरानी संधियों के 
सुराग ढूँढते है  
  
जो 
तयशुदा ढंग से 
छुपा दिए गए है 
और 
निकाल लिए जायेंगे 
उसके द्वारा 

चौथा स्तम्भ 
अब  
श्वान बन चुका है 
अभ्यस्त
प्रशिक्षित 
अनुभवी भी 

वो 
हड्डी फैंकते है 
और ये 
दौड़ पड़ता है 

ज़रा ठहरों 
क्या उसके पीछे 
जाना जरुरी है?
 
अगर है 
तो 
संग विवेक भी 
धर लेना 
क्योंकि 
आगे 
रास्ता वही दिखाएगा 
ये श्वान तो 
तुम्हे बस 
अंधी गलियों में 
छोड़ आयेगा |
उन 
अंधी गलियों में 
बिछी है 
बारूदी सुरंगे 
जो 
अफवाह भर से 
फट पड़ेंगी 

तुम्हे फर्क पडेगा 
क्योंकि 
तुम सोचते हो 
तुम्हारा
एक घर भी तो है
 
ना उनको 
ना उनके महलों को 
नीव की 
आदत ही रही कभी 
ना ही जरुरत थी|

संधिया 
अब 
दरकने लगी है 
उनसे 
मवाद 
रिसती है 
दुर्गन्ध 
आती है 
तुम सम्भलों 
श्वान को तो 
बस 
वही 
भाती है | 

Monday, April 18, 2011

भारतीयता मौलिक ही रहेगी




या यू कहे 
कि
मौलिकता ही 
भारतीयता है 
तो 
ज्यादा सही होगा 
ज्यादा करीब होगा 

उस सच के 
जो 
छुप गया है 
दब गया है 
बाजारू सोच 
और 
हरदम बिकाऊ लोच
के पीछे 
बहुत नीचे कही 

जहा 
सोच 
और 
सिद्धांत 
सजावट भर है

नैतिकता 
सापेक्ष है 

धर्म 
चर है 

और 
आत्मा 
भौतिक वस्तु सी 
बोली पर चढ़ी है 

जिसे 
तुम प्रोफाइल कहते हो | 

Sunday, April 17, 2011

क्रान्ति जब होगी





तुम
टीवी पर 
ख़बरों में 
खुद को पाओगे 
खून से सना 

नंगी होंगी 
भूख 
हवस 
और 
उसके बीच 
बेबस 
तुम 

क्या तब भी 
सोचोगे 
इधर जाऊ 
या 
उधर ?

चुन लेना 
अपना पक्ष 
ताकत 
और 
खुले शब्दों में 
वरना 
मारे जाओगे 
अप्रत्यक्ष चयन की 
मृग मरीचिका में 

आज कौन 
अपने घर पर 
कमा 
खा 
रहा है 
फिर कौन 
कहा से 
इतनी संख्या में 
मतदान को 
आ रहा है ?
एक तो 
संविधान सुन्न है 
उसपर 
चुनाव प्रक्रिया पर 
आस्था का 
संकट 
गहरा रहा है |

रक्त रंजीत 
क्रान्ति का 
अध्याय 
लिखा जा रहा है 
मंचन का 
मंथन का 
मुहूर्त 
निकट आ रहा है |

कसम खाओ 
तब तक 
बटन नहीं दबाओगे 
जब तक 
"किसी को वोट नहीं "
और 
"मेरा वोट वापस दो"
का अधिकार 
नहीं पाओगे |

Saturday, April 16, 2011

आत्ममुग्ध राष्ट्र में संविधान की ताकत




इस संविधान को 
सैकड़ो बार 
आसानी से 
बदला गया है 
इसके 
अनुच्छेदों में 
छेद कर 
घर बना चुके है 
चूहें 
कंडीकाएं अब 
बस 
काडी भर करती है  
और 
गुदगुदाती है 
अपराधी सरपरस्तों को 
सभी खंड 
उपखंड 
खंड खंड हो 
खँडहर बना चुके है 
अपने ही 
भार में दबी 
हर इबारत को 
हर बंध 
उपबंध 
ढीला है 
समर्थों के लिए 
जिससे केवल 
फंदा बनाया जा सकता है 
मजबूरों के लिए 
वंचितों के लिए 
इसका महँगा जिल्द 
मुह चिढाता है 
फटेहालों को 
सही भी है 
इस मुल्क में 
इस एक किताब 
और 
उस एक झंडे की 
हिफाजत में 
कितने क़ानून है 
जो 
बालाओं के 
चीरहरण पर 
खामोश 
पन्ने पलटता है 
इसी किताब के 
जिनमे 
लिखे है 
पैतरे 
लाज लूट कर 
इज्जत पाने के 
झोपड़े डूबा कर 
महल बनाने के 
करोड़ो चीथड़ों को 
रुलाता 
लहरा रहा है 
शान से तिरंगा 
ऐ आत्ममुग्ध राष्ट्र !
सचमुच 
तेरी शान पर
रश्क होता है | 

Thursday, April 14, 2011

"मनमोहन" तू कोई इत्तेफाक लगता है रे



इत्तेफाक नहीं लगते एक मुझे उसके आंसू और बेबसी |
उसका दर्द , मुफलिसी  बस तुम्हे इत्तेफाक लगता है ||
तमाम दुश्वारियों का तुझसे नाता बस इत्तेफाक लगता है |
मौका ऐ वारदात , क़त्ल, और तेरा होना इत्तेफाक लगता है ||
तू बेगुनाह "मन"  उनके साथ तेरा होना अजब इत्तेफाक लगता है |
पैरवी , अगुवाई , सब जगह तेरा होना भी अब इत्तेफाक लगता है ||
इस मुल्क का होना जैसे नागवार उनको, एक इत्तेफाक लगता है |
हर आफत की पैदाइश और एक "जनपथ" फिर इत्तेफाक लगता है ||
हर इत्तेफाक से इत्तेफाक खूब ,क्या ये भी बस इत्तेफाक लगता है |
तेरा होना ना होना भी "मन", सब इत्तेफाक ही इत्तेफाक लगता है ||
"आपातकाल", "बोफोर्स", "घोटाला युग" इत्तेफकों का सिलसिला है |
मुझे तो सब बेसबब ही बस सिलसिला - ऐ- इत्तेफाक लगता है  ||


Tuesday, April 12, 2011

राष्ट्र देवो भव:




ये ध्वज 
ये भूमि 
सब अपने 
इस राष्ट्र देव में 
समाहित है 
जाती से 
वर्णों से 
ऊपर 
कहीं 
सब धर्मों को 
समेटे 
एक आँगन में 
धूप छाव सा 
शहर गाँव सा 
राष्ट्र देव 
लेता है 
केवल भाव 
अर्पण करो 
वही से 
जहां 
जब 
जैसे 
तुम हो |
राष्ट्र है |
एक है |
सबल भी है |
बस
आस्था भर 
पवित्रता चाहिए 
देखो ..
वो राष्ट्र देव 
जगता है |
जगाता है |
जंतर मंतर पर 
कोई संत 
एकता का 
सूत कातता है 
अनुशासन का 
चरखा चलाता है 
स्वाभिमान से जीना 
सिखाता है |

Saturday, April 9, 2011

अब मौन मत धर लेना भारत !



जीते नहीं
अभी बस
जागे है ,
मरे नहीं है
सब मच्छर
बस भागे है |
क्रांति
कोई खेल नहीं
कि
हसते हसते
वक्त कटे
ये मौन
बतलायेगा
अब
कौन कटे ,
कौन हटे
कौन बटे
रहे अंत तक
कौन डटे |

Thursday, April 7, 2011

भागो अन्ना आता है !




भूखे पेट
सोये देश की
खोखली
बंजर
जमीन के नीचे
चूहों ने
बिल बनाये थे
कुछ तो
यही पैदा हुवे
कुछ
बाहर से
आये थे |
खाकर
दाना पानी
अब
बीज पर
नजर थी |
इसकी
अन्ना को
फिकर थी |
वो जाग रहा था
जगा रहा था
टूटा चरखा
चला रहा था
जो
दरअसल
गांधी के
रथ का पहिया था |
जिसमे
सुराज की
धुन बाकी थी
जिसने
अपनी धोती
फाड़ कर
अबला भारत की
इज्जत ढ|की थी |
उस सूत में
अभी भी
जान बाकी थी |
वो उठा
उसने शंख बजाया था
मरी भारतीयता को
संजीवनी मन्त्र
सुंघाया था |
आज वो ही
अन्ना
जंतर मंतर पर
अड़ा है
जाने किस दम पर
खडा है |
मगर
चूहों की सरकार में
मची खलबली है
दिल्ली में
अजब सी
चलाचली है
जिसे देखो
मैदान छोड़
भाग जाना चाहता है
एक ही शोर है
भागो चूहों भागो !
कि अन्ना आता है !

Monday, April 4, 2011

शर्म करो इंडिया शर्म करो !!!


क्रिकेट कभी अपनी जिन्दादिली और जांबाजी के लिए जाना जाता था , बदलते नियमों ने जहां तेज गेंदबाजी को मलिंगा जैसे चकर के हाथ पहुंचा दिया वहीँ इस खेल की सर्वोच्च संस्था मुरली जैसे चकर को विश्व रिकार्ड बनाने के लिए आधारभूत नियम तक बदल डालती है |अगर गेंदबाजी कि वह धार कायम रहने दी जाती तो कई भगवानो को आइना देखना पड़ता मगर जिस तरह नियमों का बहाना बना कर भारतीय हाकी को कुचला गया , उसी तरह WESTENDISE जैसे देश में खेल को बोथरा करने के सारे प्रयास किये गए और इसी संस्करण में २०-२० का बच्चों वाला क्रिकेट लाकर पहले ही इस खेल के चाहने वाले (समझने वाले ) दिलों को कब का तोड़ा जा चुका है | अब तो ये एक मंडी है जिसमे सब बिकता है और इस मंडी के दलाल कौन है सब जानते है |

आज बदल चुके परिवेश और प्राथमिकताओं के दौर में पिछड़ चुके भर्स्ट देश के लिए २८ वर्ष के बाद मिला यह कप किसी दकियानूसी परिवार में , बुढापे में जन्मे बालक , जैसा है |इस पर मिल रही प्रतिक्रियाये तो हमारे नितांत खाप समाजी सोच को ही बताती है | जिस खेल ने राष्ट्रीय खेल सहित सभी प्रतिभाओं को साबुत निगल लिया हो उसके अति दीवानगी दिखाती भीड़ में वो पालक भी होंगे जिनके नौनिहाल कई क्षेत्रों में देश का नाम रौशन कर सकते होंगे और हम ऐसा चरित्र दिखाए भी क्यों ना , आखिर गर्व करने के लिए , बलात्कारी भ्रष्ट और गरीब देश के पास यही तो उपलब्धि है |

ग़ालिब चचा का शेर याद आता है "हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है। "

भारत जैसा देश जिसकी ना मालुम कितनी जनसंख्या , खिलौना बन चुकी गरीबी रेखा के नीचे सड कर मरने के लिए मजबूर कर दी गयी है | जो देश शिक्षा तक का विनिवेश करने पर उतारू है | उस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी नेता , जिनमे देश के सर्वोच्च आसनों पर विराजित महानुभाव भी है , आज सभी मेहनत से कमाई देश कि पूजी खेल तमाशों पर लुटाने को बैचैन दिखते है | ये इस देश के लिए घोर शर्म और निराशा का विषय है की इसने तुच्छ स्वार्थी घरानों और प्रतिष्ठानों का हित साधने के लिए अपना विवेक भी घिनौने शो बाजार के बिस्तर पर चढ़ा दिया है |
जनता वही स्वांग रचती है जिसको महामना अपनाते है तो किस मुह से हम अपनी अगली पीढ़ी को मानवता के पाठ पढ़ा कर ये अपेक्षा रख पायेंगे की वो देश कि सदियों पुरानी साख को बढाए ना सही बरकरार ही रख सके | इस जूनून को देख कर तो भविष्य गर्त में जाता दिखता है |

शर्म करो इंडिया शर्म करो !!!

Thursday, March 31, 2011

दिवानॊ का शहर है इन्दॊर

दिवानॊ का शहर है इन्दॊर , क्योंकि युवाऒ का शहर है इन्दॊर |
बस कहनॆ भर कॊ शहर है, रहबर है यार , दॊर‍‍-ऎ-बहर है इन्दॊर |
www.whoistarun.blogspot.com

Friday, March 25, 2011

स्मृति : द्रष्टान्त एवं गायत्री मन्त्र के प्रज्ञा तंत्र(gyroscope) की नितांत अपरिहार्यता




भोला और रामा , बेलापुर से चले किशनपुर को , रास्ते में एक चौराहा आया | किसी मुर्ख उपद्रवी ने चौराहे पर संकेतक गिरा दिया था | अब बताइये भोला और रामा उस संकेतक को कैसे पुनर्व्यवस्थित करे कि उन्हें किसनपुर की सही राह मिल सके | बड़ी मासूम सी लगने वाली यह पहेली एक पत्रिका में पढ़कर , बालक हल कर रहा था | उसने चहकते हुवे उत्तर खोज निकाला और हमें बताया | उत्तर बहुत सहज था कि अगर बेलापुर , जहा से दोनों चले थे , संकेतक में उसे ठीक तरह दिखा दे तो , किशनपुर की दिशा स्वत: ज्ञात हो जायेगी |

अनायास ही भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण का वह अमर संवाद गूंज पडा कि " क्रोध से स्मृति का नाश होता है और स्मृति के नाश होने से ..."आदि आदि| हम सभी धर्म के अबूझ मार्ग पर संस्कारों द्वारा चलाये जाते है , बीच बीच में अपने विवेक (?) के कारण पथ भ्रष्ट होने का खतरा सदैव उपस्थित रहता है | ऐसे में "प्रज्ञा " रूपी "जायरोस्कोप" हमें दिशा भ्रम और सत्यानाश से बचाता है | उसी प्रज्ञा के लिए हम गायत्री मन्त्र द्वारा निकटस्थ सृष्टि बिंदु सविता की उपासना करते है | और स्वस्तिक आदि शुभ चिन्ह व ना ना विधान व ज्ञान हमें स्मृति से ही लब्ध है | जो भारत की महान मनीषा ने यहाँ जन्मे व्यक्ति मात्र को सुलभ कराया है और समस्त जगत जिसका पिपासु बना इसके गिर्द डोलता है , उसके प्रति आज जो घोर अवसरवादी उपेक्षित व्यवहार सत्ता से व्यक्ति तक दिख पड़ रहा है , वह नितांत सोचनीय व भारत वर्ष की सनातनता में उपजी हीन ग्रंथियों का दु:खद परिचायक मात्र है |

उपरोक्त विवरण के माध्यम से बस इतना निवेदन है कि , जो स्वर्णिम जीवन रत्न भारत पुत्र / पुत्री बन जन्मने का सौभाग्य हमें सहज मिला है | वह हमारे पूर्व के सतसहस्र जन्मो के सुकर्मों का फल है और हम तकनीक और विकास की नयी रीत के मारे , अपनी इस थाती को बेमोल गवा रहे है | नयी पीढ़ी से इस सन्दर्भ में आशा रखना भी मूर्खतापूर्ण जान पड़ता है |

आइये उसी सविता देवता कि शरण हो उनसे इस अज्ञान वेला की निवृत्ति हेतु नित्य प्रार्थना करे , इतना अनुरोध है |

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत् सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

Thursday, March 24, 2011

क्या बदलेगा बोलो !

अब तो कप
जीत लिया समझो
फिर
फटाको के शोर
और
बाजारू जोर में
खालिस मुद्दे
घुट घुट
मर जायेंगे
मरे किसानो
लुटी अबलाओं
की नुची चमड़ी से
शापित मदारी
डुगडुगी बनायेंगे
पत्र और चैनल
बावरी जनता को
नाच
दिखाएँगे
सिखायेंगे
नचाएंगे
और बेसुध ही
सत्ता के
बिस्तर तक
पहुचाएंगे
जहां
देशभक्ति
और
लोकतंत्र का
बार बार
बलात्कार होता है
विपक्ष
जिस पर
कभी कभार
रोता है
फिर
वही होता है
जो
रोज होता है
विखंडन
हर क्षण
विडम्बना की कोख में
वित्रश्ना के
बीज बोता है
युग
अब
क्षणजीवी हो गए है
अगुवा सब
परभक्षी
परजीवी
हो गए है
इन
जुगुप्सामय
घ्रणित अध्यायों में
मेरा मैं
बड़ी मुश्किल में
जीता है
शिव मौन हो
विवशता के ढोंग का
कटु तिक्त हलाहल
रोज पीता है
पर
मंथन
बस नाट्य भर
हो रहा है
स्वार्थी युग में
शिवतत्व का भी
शोषण
हो रहा है |

Wednesday, March 23, 2011

मन्ना बदनाम हुवे ...किसके लिए ?




नाम मन को मोहने वाला
काम
पानी पी कोसने वाला
और
मन्ना बदनाम भी हुवे
तो किसके लिए
जिस पार्टी ने
सिक्खों का
कत्लेआम किया
गांधी को
अगवा कर
अपने नाम किया
अरे मिया
माना
की
बदनामी के
बहुत है
छिछोरी
राजनीति में फायदे
मगर
सदन में बैठने के भी
होते है कायदे
आज
पिछले दरवाजों से
घुसाने वाला चूहा
चुने हुवे
प्रतिनिधियों को
हुंकार रहा है
देश का
राशन पानी
मय दल खा पीकर
डकार रहा है
और
नाकारा विपक्ष
उसके
छिच्चोरे शेर पर
बगले झाँक रहा है
अरे
जनता से
गलती हो गयी भैया
तो अब क्या
देश का चिर हरोगे
तब ही चुल्लूभर
थूक में डूब मरोगे ???

कितने राजा
कितने कलमाड़ी
कितने पवार
पैदा करोगे
तुम वो भस्मासुर हो
जो
देश को
साथ लेकर मरोगे

ऐसी निकम्मी सरकार
और
हिजड़ों की फौज
आज
सत्ता पर काबिज है
कि
इस देश का
अब
अल्लाह ही
हाफिज है

Tuesday, March 22, 2011

सोलहवे चुनाव के नज़ारे






बहुत सारे
गांधी
नजर आयेंगे
कुछ लोगो को
राम भी
याद आयेंगे
बाबा रामदेव भी
जुगाडासन लगायेंगे
दो चार करोड़
फर्जी
और
बीस पच्चीस करोड़
विथ मर्जी
वोटर लिस्ट में
जुड़ जायेंगे
बेरोजगार
दिग्भ्रमित
युवा
ना ना मोर्चो के
झंडे उठाएंगे
जेल भी जायेंगे
लाठियां
गोलियां
खायेंगे
सिम्पेथी की खातिर
एकाध गांधी
लुढ़का भी दिए जायेंगे
बीते मुद्दों की
मटियामेट
मजारों पर
भाषणों के
बासी फूल
चढ़ाएंगे
घराने
पुराने
दीवाने
सभी
किस्मत आजमाएंगे
छुट्टी वाले दिन
माध्यम वर्गी
झुंझलाते
निम्न वर्गी
धकियाते
उच्च वर्गी
इतराते
बटन दबाने जायेंगे
अंततोगत्वा
करोड़ो गधे मिलकर
नया धोबी
चुन आयेंगे
जो
संसद के
धोबीघाट पर
कलंकितों के
काले कपडे धोएगा
वक्त बेवक्त
विदेश जाकर
सोयेगा
मीडिया
और
विश्व मंच पर
रोयेगा
इससे
हमारी
निरुपारॉय वाली
रोतालू इमेज
फिर जमेगी
नयी सरकार
लुट खसोट के
नए पैतरे चलेगी

अपन को
इसमे
कोई इंटरेस्ट नहीं है
ये इंडिया
अपना भारत
जो नहीं है
अपने राम तो
स्वराज्य से सुराज के
सपने बुनेंगे
ऐसे ही किसी
लोकतंत्र के
मातमी ठीये पे
अपन फिर मिलेंगे

Tuesday, March 8, 2011

हमार गुजारिस !

सोचा
चलो एक याचिका
हम भी
डाल आते है
क्या है ना कि
यहाँ के जज
हमारे मौसा है
तो साहब
डाल दिए अर्जी
कि
इच्छा मृत्यु चाहिए
बुलाये गए
कोर्ट मा
दुई वकील
पिल पड़े
सरकारी किताब का
लट्ठमार भाषा में
क्यों भाई कल्लू
इच्छा मृत्यु चाहिए ?
हम कही
हां साहेब
हुई सके तो
बड़ी मेहरबानी होगी
कागज़ पत्तर
सब तैयार है
कौनो कमी रही
तो हुजुर देख ले
बाकी तो
आप खुदे समझदार है
जो खर्चा होगा
देख लेंगे
एक बार
इच्छा मिरतु मिल जाय
बस
हमारे चहरे को
बड़े गौर से
तक रहे थे
काले कोट वाले बाबू
गले मा अटक गया
उनके तमाकू
बोले हीचकाय के
डोले मचकाय के
क्या राशन कार्ड बनवा रहे हो
हमें कोर्ट में ही
रिश्वत खिला रहे हो
अरे भाई
क्यों
अदालत का वक्त
बर्बाद करते हो
बताओ बात क्या है
क्यों मरना चाहते हो
एड्स , केंसर
या लकवा हुवा है ?
या ब्रेन डेड हो लिए हो
अरे भाई
अदालत ने
अभी छूट नहीं दी है
अभी संसद की
मुहर बाकी है
इसीलिए हमने
इस पर
ना
की है
का कहा हुजुर
तो का
इच्छा मिरत्तु भी
संसद ही देगी
ससुरों के पास
पहले का
पावर कम थी
जो उनका
जमराज बनाय रहे हो
अरे हत्यारन हाथों
इच्छा मृत्यु
थमाय रहे हो !!!
अरे
हम तो सोचे थे
महाभारत के
भीष्म की तरह
देश की जनता को
वरदान मिला है
एही खातिर
अरजी दिए थे
के कम से कम
मरने का अधिकार
तो
अपना होगा
अब तो लागत है
घर मकान
खेत दूकान
कि तरह
ये भी बस
सपना होगा

त़ा हम तो
बुझ लिए
बकील बाबू से
और
देखे जाइत है
गुजारिश
बाकी
ऐ हमार
किसान
मजूर भाई
ना मरिहोऊ
छोड़ के
घर बिटुआ
देश
इन हरामियन के हाथ
छोड़ के लावारिस |
बस
आपन तो
इतनी ही हो
जनता से गुजारिश |

Monday, March 7, 2011

ख़रीदे टिकट का दरद देखिये !

ट्रेन के डिब्बे में
गपशप थी चालू
सभी खा रहे थे
समोसे बिना आलू
प्रधान जी बोले
अरे भोले
रेलवे का भी
बड़ा बुरा हाल है
लगता था
पहले
लालू की ससुराल है
अब ससुरा
पूरा बंगाल है
ये मिनिस्टर
इसे
भैंस की तरह
हांक रहे है
और हम
बर्थ के लिए
हाफ रहे है
और चारा ही क्या है
बिटुआ
पूरे देश का
ऐसा ही हाल है
कही बाढ़
कही जाड़ा
कही अकाल है
ऐसे में
जनता करे भी
तो क्या करे
जब
पी एम् ही लाचार है
हमने पूछा
चचा
टिकट लिए हो
बोले हां बिटुआ
हमने फिर पूछा
प्लेटफार्म पर
थूके हो
बोले हां बिटुआ
कितना मजा आया
मजा क्या बिटुआ
हक़ बनता है
टिकट लिए है
पूरा दस रुपिया दिए है
हमने कहा
उ जौन
राजधानिया में
बैठे
देश पर
कुल्ला करत है
उ दरअसल
टिकट खर्चे का
दरद है
अब बुझे
अरे
बुझे की नाही
लिखत लिखत
हमारी तो
सुखी जाय है स्याही

जय राम जी की भैया !

Thursday, March 3, 2011

हमारी भी गिनती हो गयी !

हरिया खुश
घरवाली खुश
चलो
हमारी भी
गिनती हो गयी

टीचर पस्त
कर्मचारी त्रस्त
अब
बेगारों में
इनकी भी
गिनती हो गयी

सरकार मस्त
तेज है गस्त
चलों
ये भी
खानापूर्ति
हो गयी

कौन गरीब ,
कौन किसान ,
अगड़ा ,
पिछड़ा ,
महिला ,
पुरुष ,
सब
गडमड पडा है
सरकारी गोदामों में |

अब
इसमे से
आंकड़े
निकाले जायेंगे
अंदाजे
लगाए जायेंगे
विदेशो से
ऋण
उगाहे जायेंगे

ना
गरीबी घटी
ना ही बढ़ी
विकास दर
लो
हमने
मानदंड ही
बदल दिए
अब देखो
नए चश्मे से
सब
हरा हरा
दिखाया जाएगा
सन पचास को
नया माडल
बनाया जाएगा

नयी
जनसंख्या नीती
और
विकास की
अफलातूनी झांकी
सजाई जायगी
फिर
दस बरस बाद
नयी
जनगणना की
डुगडुगी
बजाई जायेगी

तब तक
जो हाथ पैर
मार सका
खुद ही
किनारे
लग जाएगा
बाकी का
भारत
खुद ही
सलट जाएगा

ज़रा पूछो
ये
किसे
मुरख बनाते है
और
किस मुह से
नयी पीढ़ी को
पुराने सबक
पढ़ाते है

आज
कितने सरकारी
स्कूलों में
शिक्षक आते है ?
श्रेष्ठी वर्ग के बच्चे
किस स्कूल में
जाते है ?
बिना ईलाज
कितनी मौते
रोज होती है ?
किसानो की
आत्महत्या पर
कितनी विधवाएं रोती है ???

कितने लोग
फूट्पातों पर
सोते है ?
कितने
बलात्कार
हर मिनट होते है ?
मासूम बच्चे
क्यों
बोझा
ढोते है ?
आज भी
मंत्री की
उपस्थिति में
कितने
बाल विवाह
होते है ???

किसके बच्चे
विदेशों में
पढ़ते है ?
किसके बच्चे
मिटटी से
भविष्य
गढ़ते है ?

कौन
बेवकूफ !!!
अपने
आँख के तारे को
सीमा पर
भेजता है ?
किसका दिल
भूख पर
पसीजता है ?

कौन
चुराता है टेक्स ?
किसके घर
पड़ते है
दिन में भी डाके ?
किसको
करने होते है
हर रोज फाके ?

कोई जनगणना
जवाब नहीं देती
किसी
देशहित के सवाल का
कौन खर्च उठाता है
आखिर
इस तुगलकी बवाल का ?

Monday, February 28, 2011

अजब बन्दर बाट है साहब [:)]

बजट आते रहेंगे
जैसे
आजादी के बाद
दसियों बार
आये
और
बीत गए

बीत गए
सो
बीत गए
अब उनका
कोई भान नहीं
ये वाला
नया है

नया है
मगर
पुराना है

नया है
क्योंकि अभी
आया है
संशोधन
अभी
बाकी है ...मेरे दोस्त

पुराना है
क्योंकि
चौकाता नहीं है
फुसलाता है
उम्मीद
जगाता है
सरकार
बचाता है
ढोल
बजाता है
शोर
मचाता है

मगर
इसमे
बहुत से
मगर है
किन्तु है
परन्तु भी है
जिन्हें
जाहिर होने को
पूरा सत्र
पडा है
जल्दी क्या है
अभी तो
जनता खुश है
सरकार
उनींदी है
शेयर
उछल रहे है
प्रचार / समाचार तंत्र
मचल रहे है

कुल जमा
चार
सब खुश है
यार
तो तुम क्यों ...
ख्वामखा
रुसवा होते हो
क्यों नहीं
बहती गंगा में
हाथ धोते हो

मगर नहीं साहब
बुद्धिजीवी होना भी
कम बीमारी नहीं है
जिसका कोई
ईलाज नहीं है

बड़े मियाँ सोच रहे है
मंसूबों के
तम्बू तान रहे है
स्विस अकाउंट को
अपना मान रहे है
उन्हें लगता है
लौटे हुवे रुपयों में
बिटिया ब्याह जायेगी
राधे को लगता है
उसके खूंटे भी
जरसी बंध जायेगी

बाबा
के साथ
सब
टकटकी लगा
ताक रहे है
सरकारी गल्ले में
झाँक रहे है
बाहर से पैसा
अब आया
कि
तब आया
मगर
फिर मगर
क्या करे
दिल्ली के
तरणताल में
मगरों का
मोहल्ला है
गरीब के चौके में तो
बस
बर्तनों का हल्ला है |

Friday, February 25, 2011

फाटक रहित रेलवे क्रासिंग

देश खडा है
बैलगाड़ी में
लादे
अपेक्षाओं के
अनबिके धान
और
निचुड़े पसीने वाला
पिरोया हुवा
किसान/ मजदूर
इस ओर
जिधर से
पगडंडी
गाँव को जाती है
उधर
पटरी के
उस तरफ
अनियंत्रित
शहर है
स्वछंदता
और
व्यस्तता की
धूल से अटा
बीच में
पटरी है
विकास की
जो
राजधानी
ले जाती है
अपराधियों
बलात्कारियों
देशद्रोहियों
और
चाटुकारों को
कल ही
गाव का हरिया
और
परसों
शहरी
सरिता की
लाशें
कटी मिली थी
इस
बगैर फाटक की
रेल लाइन पर |

Thursday, February 24, 2011

सोचता हूँ

सब ऐसा ही क्यों है
बदलता है
तो
बदलता क्यों है
जो थमा है
बदलता क्यों नहीं है

अजीब सी
तंद्रा
उदासी है
चहु ओर छाई है
जो
हर बदलाव की
खबर भर से
बैचैन
हो उठती है

कोहरे में
टटोल कर चलना
आँख वालों में
आदत
बन चुका है
सहन नहीं होती
धूप की चुभन
सदियों से
बंद आँखों को

ये कौन
आँख का अंधा
शोर मचाता
चला आ रहा है
इसे रोको
वरना
सब
देखने लगेंगे

और पायेंगे
ठगा सा
खुद को
तब
बड़ी शर्मिंदगी होगी
.....
खुद से |

Monday, February 14, 2011

दिव्य प्रेम एक ही है, "श्री राधेकृष्ण" का

|
प्रेम को प्रेम ही कहे तो दुराग्रह और क्लिष्टता का शमन होता है , भ्रान्ति भी नहीं रहती | "प्रेम" के आरम्भ में बड़ी सुन्दर प्रतीति होती है , यहाँ प्रेम प्रयोजन होता है , प्रेमी अभिलाषी , अवलम्ब और प्रेमिका आधार | प्रेमी ,प्रेमिका के अंग , सञ्चालन , भाव , विचार , आचार , विभूति , ऐश्वर्य , आभा , ख्याति आदि सद्गुणों को अत्यंत तीव्रता से ग्रहण करता है | यहाँ वर्जनाओं और प्रेमी / प्रेमिका में दोष ढूंढे नहीं मिलते | प्रेम का प्राकट्य बड़ा अनिश्चित व विस्मयकारी होता है | अपने निजी मित्रों सम्बन्धियों तक से छुपा कर रखा जाने वाला यह भाव , प्रकट होने को आतुर रहता है | इसकी सफलता अभिष्ट के समक्ष उद्घाटित होने पर और उसकी अनिश्चित प्रतिक्रया पर पूर्णतया आश्रित रहती है | उचित स्थल , अवसर की प्रतीक्षा और अपने मनोभावों को श्रेष्ठतम कलेवर में प्रस्तुत कर पाने का स्वप्न संजोये प्रेमी ह्रदय , रातों को जगता है , दिन में जगता ही स्वप्न देखता है |

तुच्छ सांसारिक मोह ,व्यर्थ और अनुपादेय जान पड़ते है | भीतर बहुत क्लेश और पीड़ा में कोई वस्तु औषधि नहीं जान पड़ती | जब प्रेमी / प्रेमिका से मिलन कि भावना पराकाष्ठा पर पहुच जाती है और मन ना ना भय से ग्रस्त शंशय और संभ्रम की दशा में पहुच जाता है तो कई बार प्रेमी का व्यवहार असहज हो उठता है | इसमे विरले अवसरों पर व्यक्तित्व में आमूल और स्रजनात्मक परिवर्तन परिलक्षित होते है जो अपने आभामंडल से समस्त जगत को आलोकित , आनंदित करने का सामर्थ्य रखते है | ज्यादा अवसरों पर व्यक्तित्व में उतराव दिखता है | यही पर वह भेद प्रकट होता है जो प्रेम को सब भावनाओं में श्रेष्ठ और निष्कलुष बनाता है |
प्रेम के साक्षात लौकिक स्वरुप की लीलामय झांकी में दोनों पक्ष मानो मानव शारीर धर प्रकट हुवे हो ऐसी महिमा है श्री राधेकृष्ण अवतरण की | यहाँ राधा जी ही स्वयं श्री कृष्ण है और वैसे ही कृष्ण राधा ही हो गए है | आगे राधा को कृष्ण और कृष्ण को राधा पड़े |
प्रेम में अपेक्षा रहती है और जहा तक लौकिक समझ का प्रश्न है उसकी मर्यादा अनुसार , प्रेमी प्रेमिका का संयोग ही मिलन ही प्रेम की पूर्णता है | इस भाव से भी देखे और इसकी अपरिहार्यता को एक ओर रख कर भी देखे तो राधेकृष्ण सम्पूर्ण प्रेम को परिभाषित और पूर्ण करते है | भक्तों का यह अटूट विश्वास है कि गोलोक में सर्वेश्वर अन्तर्यामी प्रभु राधिका जी के साथ नित्य निवास करते है |
ये इंगित करता है कि लौकिक रूप में भी उस महा अवतार के मिलन को स्वीकार और पूज्य माना गया है | तथ्य और कथा कहती है , श्री कृष्ण के मथुरा प्रयाण के पश्चात राधे कृष्ण का विछोह अनंत हो जाता है | यह विकल्प जगतपति और युगांतकारी कृष्ण स्वयं चुनते है | श्री राधिका उनका समर्थन करती है | इसका अभिप्राय यह नहीं है कि वे एक दुसरे को प्रेम नहीं करते अथवा श्री कृष्ण के सामने राधा का विछोह अनिवार्य शर्त रहा होगा | जैसे कहा गया है कि प्रेम अपनी पराकाष्ठा में सम्पूर्ण जगत को आप्लावित कर देता है और प्रेमी एक दूसरे को कण कण में व्याप्त सदा और सर्वत्र देख पाते है, फिर जगत की परिभाषाएं और विदम्बनायें उनके सामने बहुत तुच्छ हो जाती है | ना राधा कृष्ण एक दुसरे का त्याग करते है ना उनका प्रेम समाप्त ही होता है वरण वह अगले सोपान पर पहुचता है | जहा कृष्ण राधा है और राधा कृष्ण , फिर विछोह का तो प्रश्न ही कहा रह गया | यह पूर्णता को जग कल्याण हेतु समर्पित करने जैसा है | वो राधा कृष्ण ही है जो आगे दुष्टों का संहार कर गीता के अनमोल वचनों में सनातन धर्म को पुनरप्रतिष्ठित करने का महाव्रत पूर्ण करते है | जिसकी अक्षुन्न धारा में कलियुग के भीषण झंझावात भी भक्तों का कुछ नहीं बिगाड़ पाते |
आज की पीढी को आवश्यकता है कि वह जाने इस राधाकृष्ण अवतार को और उसके लोकोत्तर महात्म्य को भी | जिसने भारत भूमि को धरा का भूषण बनाया है | संत वेलेंटाइन के निर्वाण दिवस पर सभी भक्तों के ह्रदय में प्रभु के पदप्रिती का बाहुल्य हो यही कामना है |

श्री राधे राधे !

Thursday, February 3, 2011

आज से , अभी से...यही से |

इस देश को
एक झंडे
एक नक़्शे
एक भाषा
और
एक भाव में
देखना
असंभव है |

जब तक
कोई
आक्रमण ना हो
विजय ना हो |

युद्ध ही
मात्र विकल्प है
यदि तो
युद्ध ही सही
साथ खड़े हो
भुलाकर
अबूझ रेखाएं
आओं
सम्हाले
बनाए
मिटती
सिमटती
सीमाएं |

मात्र प्रहरी
नहीं लड़ पायेंगे
आक्रान्त
पडोसी से
आओ
एक हो
उन्हें
अपना
मंतव्य बताये
उनका
मनोबल बढ़ाये |

यही से
अभी से
तुम भी
मैं भी
सेनानी बन
लिखे
पढ़े
कहे
सुने
गुने
कुछ भी
जो पास हो
सहज हो
राष्ट्रहित में
हर संभव
कदम
उठाये |

पर
बढाने से पहले
जरुरी है
स्वर ना सही
कदम
मिलाएं
हाथ
मिलाएं |

जरुरी है
हर
स्वघोषित
महामना से
नजर मिलाएं
गर्व का भाव
गुनाह नहीं है
जरुरी नहीं है
मातहत ही
केवल
सर झुकाएं |

सेवाओं में भी
सरोकारों में भी
वय से
अनुभव से
अवदान से ही
सम्मान दे
मान पाए |

गर बदलना है
विडंबनाओं को
दोहराने से
तो सीखना होगा
पिछले अफसाने से |

बुरा नहीं है
इतिहास पढ़ना
बुरा है
पढ़ कर
भूल जाना |

उन्हें
तुम्हारी जयंतियों
और
मालाओं से
कभी
कही
सरोकार नहीं रहा
अरे
ये कर्तव्यपूर्ति कर
किसे भरमाते हो
क्या कभी
रक्त सिंचित
स्वतन्त्रता के
उपभोग पर शर्माते हो ?

यदि हां
तो
कभी पीछे मत चलना
गद्दारों के
ये यंत्र है
रुपयों के
हथियारों के |

यदि ना
तो
ये तय रहा
तुम्हे भी मिटना होगा
साथ
इनके
पिस जाते है
जैसे
गेहू के साथ
घून
तिनके |

Wednesday, February 2, 2011

दोस्ती की दुनिया

खुशगवार मौसम में
जैसे तबियत भी
और
मौका भी
दस्तूर भी
ऐसी खुशनसीबी सा
होता है दोस्त |

जब
गम से
और
दुनियावी थकावट
या
बनावटों से
उकताई आँखे
मुंदती हो
खुशबू भरे
ठन्डे
मगर
गर्म अहसासों से
सराबोर
बासंती झौके से ...

वो
उतर जाता है
सहलाते हुवे
सपना बन
मन की
अतल
सूनी
गहराइयों में
जैसे
स्वाति बूंद
चुपचाप
किसी
सीप में
उतर जाती है
मोती होने को |

प्रतिध्वनित होता है
मेरा हर स्पंदन
उस
सांझा मन में
कहना नहीं पड़ता
और
वो
भाप जाता है
मेरा
सारा दू:ख
संताप
जिसके साथ
जीवन की
सारी खुशिया
बाटी जा सकती है
केवल एक
चाय के प्याले से
ऐसा
बिना शर्त
बेतर्क
बेतुका (दुनिया के लिए)
होता है दोस्त |

दोस्त
तब भी
वहा भी
होता है
जब
कोई नहीं होता
मैं भी नहीं
तब भी
पीछे
होता है दोस्त |

Monday, January 31, 2011

कागार

आकार ले रहा था
बवंडर
सागर के उस पार
जिसका पानी
सदियों से उपेक्षित
मानव अश्रुओं से
कड़ुवा गया है
अभी
असंतोष दूर है
अपनी
दहलीजों से
मगर
नहीं टलेगा
महज
खोखली
सरकारी दलीलों से|

हमारी अपनी
जमीन पर
अब
रेत उड़ने लगी है
नफ़रत की नागफनी पर
बारूदी फूल
पनपने
झरने लगे है
लोग
अपने में ही
सहमने
सिमटने लगे है
ये दूरियाँ
और
क्षेत्रीय दुराग्रह
राष्ट्र रूपी चदरिया को
चिंदी कर रहे है
सब
बंगाली
मराठी
उर्दू
असमिया
तमिल
तेलुगु
हिंदी
कर रहे है|

अब कबीर भी
निरपेक्ष नहीं रह गया
वंचितों में
ऐसे
संभ्रांत पल रहे है|

युवा
सपनों की
पूजीवाद प्रायोजित
मरीचिका में
स्वयं मृग हो
अपने ही को
छल रहे है|

युग बदलने वाले
रोज
दल बना रहे है
बदल रहे है|

कोहरे का ताल्लुक
मौसम से
नहीं रह गया
वैसा
सभी मौसम
कोहरे ही में
पल रहे है |

आप
कब
उधार लेकर
पता
बदल रहे है ?

Sunday, January 30, 2011

हे राम ! ये हरी पत्ती , लाल पत्ती ! !!

तुम राम कह कर गए
कुछ काम भी
कहा तो था ...
मगर
तुम्हारी तस्वीरों से
तिजोरिया भरते भरते
तुम्हारे आदर्शों
जीवन मूल्यों को भी
बेच दिया
हमने
महंगे
बहुउपयोगी
डॉलर के बदले |

तुम्हारे चित्र छपी
हरी पत्ती से
अब
इस देश में
ख़रीदे जाते है
जिस्म
ईमान
और
वोट |

और
हर जुबां
जो
सच बोलती थी
बोल सकती थी
उसके होटों पर भी
चिपका दी है
हमने
तुम्हारे चित्र वाली
कुछ हरी पत्ती |
कुछ लाल पत्ती |

Tuesday, January 25, 2011

गणतंत्र दिवस पर खिचड़ी की प्रसादी

मैंने बचपन से
सुभाष और भगत को
घुट्टी में पिया है
मुझे पता है
तिलक ने
गांधी ने
इस देश के लिए
क्या किया है

आज
उस भोगे हुवे
अतीत पर
रचा गया
यथार्थ भारी है
मुझे नहीं पता
सचिन के
अलंकरण के
क्या निहितार्थ है
मेरे लिए तो
ये भी
एक और
राजनीतिक कब्ज
और
प्रचार की
आम सी
बीमारी है
वो
जो दिल्ली में
पच्छिम की तरफ
मुह कर के सोते है
उन्हें
सुबह
अमिताभ
और
सचिन से ही
जुलाब होते है

जिनकी तिजोरियों में
बंद है
जय जवान
जय किसान
का नारा
जिन्होंने
सच
और
कर्तव्यों से
कर लिया किनारा
वो
सरहदों पर
संगीनों से
गुलाब बोते है
जिनकी सुर्ख
पंखुरियों पर
विधवाओं के आंसू है
वो
शहीदों के कफ़न
रोते है

रोज
जिनके कारण
लाखों
जवां स्वप्न
फैलती चारागाह में
ज़िंदा ही
दफ़न होते है
ऐसे
सरफिरों की
नाकारा
और
खोखले
मानस की
इबारत है दिल्ली
क्या रंज
गर उडाता है
प्रबुद्ध विश्व
गाहे बगाहे
भारत की खिल्ली |
किसी ना किसी
हवाई अड्डे पर
आज नहीं कल
नंगे हो जाएंगे
ये भी शेखचिल्ली |

खैर
मैं तो
उबल रहे अंतस पर
अपनी
प्रज्ञा की आंच से
जागरण की
खिचड़ी पकाता हू
देखता हू
आपसे प्रतिक्रया में
कितनी
मुंग
कितने
चावल
पाता हू |

सभी सह्रदय को
गणतंत्र दिवस पर
बधाई हो बधाई
क्या हुवा
जो आज
वो
दावत उड़ा रहे है
कल
तुम्हारी भी
बारी तो आएगी
तब बात करेंगे
सच
और
साहस की
मुझे तो आदत है
बक बक की
यू ही
नाहक की |

आपका विनीत
तरुण कुमार ठाकुर
www.whoistarun.blogspot.com

कैसा गणतंत्र ये !

ना नर रहे
ना नरेश ही
बस
गणतंत्र है
जिसके
कई
गूढ़ मन्त्र है
जो साध लिए
तो होओगे
उस तरफ
जहां
सरकार है
व्यापार है
वरना
इधर
जहां
सब लाचार है |

विनम्रता के
मुखौटे लगाए
परिचारिका सी
गणाध्यक्ष है
लम्पट नेता
और
छटे हुवे
मंत्री है
दागी अफसर
और
दयालु अपराधी भी है
सचमुच
दौर पूरा
जोर सारा
उदारीकरण पर है |

न्यायालय
तूती से बोलते है
माध्यम
हकलाते से
लगते है

जनता
बढ़ जाती है
हर जन गणना में
और
बंट भी जाती है

राष्ट्र भाषा
मौन है |
राष्ट्रीय पशु
नेता है
जो चर जाते है
सकल घरेलु आय
और
उत्पाद भी
बचे खुचे
हौसलों के साथ

इस राष्ट्र को
आत्मप्रवंचना की
शाश्वत बीमारी है
मूक होकर
देखना
सहना
संविधान प्रदत्त
लाचारी है

वैचारिक गुलामी
और
नैतिक पतन का
अंधा युग
अब चरम पर है
लगता है
पाबंदी
बस शरम पर है !

Monday, January 24, 2011

संविधान की पुण्यतिथि पर

शोक सभा होगी
लालकिले पर
तिरंगा फहराएंगे
नए नवाब
अति विशिष्ट अतिथियों
और
हद दर्जे कि सुरक्षा में
होगी परेड
जिसमे
नहीं दिखाया जाएगा
गरीब किसान,
महँगा राशन ,
कसमसाती गृहणी ,
लुटती व्यवस्था ,
ना ही
दर्शन होंगे
क्षेत्रीय
या
भाषाई एकता के
बल्कि
भाषण से झांकी तक
अनेकता ही दिखेगी
जिसमे
जोड़ दिया जाएगा
कोई नया अध्याय

सिमटती
सीमा रेखा पर
शर्मसार नहीं होना
गर्व करना
उधार
और
आयात के आयुध पर
जो
बढ़ते करों
और
शिक्षा
स्वास्थ्य
की कटौती से
ख़रीदे
कबाड़े
जायेंगे

स्वप्न दिखाती
परिकथा सी होगी
भाषण की परिपाटी
एक बार फिर
शर्मसार होगी
अमर ज्योति पर
शहीदों की माटी |

Saturday, January 22, 2011

मौलिक अधिकार

आम नागरिक होना
हमारा मौलिक अधिकार है
और नेता चुनना
हमारा मौलिक कर्तव्य
सो किसी भी
अन्य अधिकार जैसे
हम इसे भी
एन्जॉय करते है
और
कर्तव्य
अनेको
अन्यान्य कर्तव्य जैसे
निभा दिया जाता है

जब चाहे
हमें आदेश दे
हम
आँख कान मूंद कर
छटे हुवे
काईया नेताओं
और
छुटभैयों
या
रसूखदारों में
किसी को भी
पहुचा देते है
वहां
जहां से
वो जैसे चाहे
खेलते रहे
सता के खेल

हम
तभी चौकते है
जब बात
अधिकारों तक आती है
आखिर
आम होने का
ये ख़ास अधिकार
हमारी बपौती है
सो
महंगाई बढ़ा कर
भ्रष्टों को आश्रय दे
सरकार
हमारे उसी अधिकार की
रक्षा ही तो करती है

तो फिर
हम क्यों लड़े
उनसे
जिन्हें
हमने ही चुना है
अपने
कर्तव्यों का
पालन कर के

फिर
शाहजहाँ की तरह
ये भी तो
हाथ काट लेते है
हमारे
सत्ता के
ताज निर्माण के बाद !

संविधान ???
नहीं देता हमें
इन्हें
सत्ता च्युत करने का
मौलिक अधिकार ???

Friday, January 14, 2011

बसंत गुमनाम है !

उसे सब बसंत कहते है ,
अपनी पसंद भरते है ,
उसकी बाते भी करते है ,
इंतज़ार करते है ,
इसरार भी
मगर
कोई उससे नहीं पूछता
कि
क्यों बसंत उदास रहता है
भटकता रहता है
संग लिए
पागल पवन
और
सूखी
नाकाम
प्रेम पातियाँ
जो
कभी नहीं पहुचती
प्रेमी ह्रदय तक
उन्हें
कवि बटोर लेता है
वाचता है
आंसुओं में लिखी
आरजुओं की गज़ल
और
रचता है
विरह
और
वेदना में डूबे
प्रणय गीत
हे बसंत !
वो भी
तुम्हे कोई नाम
अब तक तो नहीं दे पाया |