Monday, December 27, 2010

नव वर्ष तुम कैसे हो ?

नव वर्ष तुम कैसे हो ?
नया वर्ष
बस आने को था
तो सोचा
हाल चाल पुछू
पुछू कि
इस बरस
कैसा रहेगा
लाभ हानि
जमा खर्च का
अनसुलझा गणित
और
कैसी तबियत
रहेगी
दुश्मनों की
रकीबों की
हबीबों की
जानशिनों की
जानना चाहता था
फलसफा भी
हाल-ऐ-दुनिया
हाल - ऐ दिल भी
मगर
दिनों दिन
रातो रात
उछलती
उफनती
महंगाई की बाढ़ में
बह गए
डूब गए
सारे प्रश्न
बस
कुछ
बचे खुचे
सपनों की गठरी
सर पर लादे
शरणार्थी सा
बैठा हू
कि
आओ नव वर्ष
बचा लो
मुझे
और
मेरे निरीह देश को
इन बेईमान
और
मक्कार नेताओं से
जो
ना मरने देते है
ना जीने ही देते है
लूटते है दोतरफा
और
बिना टेक्स
ना तो
मरहम देते है
ना
मरने की इजाजत ही देते है

आशा ही करता हू
कि
नया वर्ष
शुभ होगा
उनके लिए भी
जिन्हें
हर बरस
इन्तेजार रहता है
कि
नया बरस
केलेंडर के साथ
बदल देगा
बूढी
मरियल
लाचार
व्यवस्था को
ताकि
जवां खून
दौड़ सके
पिछड़ते
देश की रगों में
और
लाचार
बूढों को
मिले कुछ विश्राम
क्योंकि
देश के सर्वोच्च आसन
सोने के लिए तो
नहीं बने है ना |

Sunday, December 26, 2010

पताकाएं

आकाश छूती
लहराती
इठलाती
शिखर पर
आच्छादित है
मुखर है
आह्लादित भी
मानो
वही चरम हो
समस्त
उत्कर्ष का
वैभव का
संकल्प का
नीचे
पड़ी है
पुरानी पताकाएं
धूसरित
चीथड़ों में
बदलती
सिमटती
संकुचाई सी
अभी
कोई भाई
नमन करता
नई पताका को
पाँव धर
गुजर गया था
दिन में
कई बार
घिसटते
फटते
चिंदी चिंदी हो
बह जाएगा
उड़ जाएगा
उसका
हर रेशा
कोई
जा पहुचेगा
नई पताका के
बहुत निकट भी
तब
शायद
उसे भी
इसकी मुक्ति पर
रश्क तो होगा |

Tuesday, December 21, 2010

मोक्ष की शतरंज

एक प्यादा
पडा था उपेक्षित
कुछ टूटे खिलौनों के पास
दोस्त ने उठाया
पूछा
होकर उदास
क्यों मित्र
तुम तो बुद्धिजीवी हो
भावनाओं से ऊपर
क्या कोई व्याख्या है
जो
इस मोहरे को
समझ सके
समझा सके
मैंने हंसकर
फिर
तनीक गंभीर हो
विषय को छुवा
कहा
मित्र
उससे पहले
उस बिसात की भी
दास्ताँ कुछ कहूंगा
वरना
अधूरा ही होगा
जो कहूंगा
एक दिन
यू ही
खेलते अचानक
झगड़ पड़े दो भाई
बचपना था
बात भी थी
उतनी ही छोटी
जितना
उनका बचपन था
फाड़ करके
दो बिसाते कर दी गयी
उस दिन
फिर
खेलते रहे
वो दोनों
अपनी अपनी बाजिया
अपनी बिसातों पर
जो
उनकी ही तरह
अधूरी थी
फिर
एक दिन
मोहरा मोहरा
खोते खोते
ये प्यादा बचा है
इसकी तो
नियति ही है
पिटना
मरेगा ही
चाहे मार कर मरे
कभी किसी बिसात पर
फिर चढ़ेगा
इतराएगा
मरेगा मारेगा
कभी कभी तो
बन बैठेगा वजीर
और
कुछ पल
हुक्म भी चला लेगा
मगर अभी
ये मौन है
ये
अभी
ज्ञात मोक्ष है!
और
इसके खो चुके साथी भी
जब तक
चढ़ा नहीं दिए जाते
चुन नहीं लिए जाते
किसी मजबूरी के एवज
तब तक
उनका भी
अज्ञात मोक्ष है !

समझो मित्र
तो
आसान लफ्जों में
मुक्ति ही
मोक्ष है
नहीं तो
मोक्ष भी
बस
अंतराल है |

Thursday, December 16, 2010

राम !

राम !
शिव के लिए
बस एक बार
और
किसी वाल्मीकि
अहिल्या
या
शबरी के लिए
कोटि बार
आखिर
इस नाम रटन में
ऐसा क्या नशा है
कि
हनुमान अब भी
जी रहे है
लड़ रहे है
मृत असुरों की
छोड़ी हुई
आसुरी वृत्तियों
और
चित्त के अनुराग से

जरुर कोई बात रही है
तभी तो
कोई भील..
आदिकवि ,
कोई भीलनी ..
आत्मज्ञानी ,
कोई पतिता..
पाषाण से मनुतनया
और
कोई राक्षस
वैष्णव हो गया |

आखिर
कैसी प्रखरता है
इस "राम" नाम में
जिसने
पाषाण तरा दिए वारिध में
और
जिसका संबल ले
आक्रान्ताओं को
जीत लिया
एक अधुना साधू ने
आज
ऐसे ही तो
नहीं शीश झुकाता
विश्व का जटिल तंत्र
राजघाट पर
भले फिर
अयोध्या में ना बने
प्रपंच और स्वार्थ का "राम मंदिर"
राजघाट पर
एक राम मंदिर में
आज भी जलती है
राम ज्योत
और जहां
हर धर्मनिरपेक्ष
और साम्यवादी
भूल जाता है
कि
वो खिलाफ खडा है
उसी
"राम" नाम के ...

शत शत नमन है
ऐसे ही
"राम" के जियालो को
के
अब तो फैलने दो
दल वालो
इसके अमर उजियालो को |

खैर
तुम चाहो ना चाहो
एक "राम नामी" ही
बहुत है
हर युग में
जो ललकारेगा
हराएगा
तुम्हारे बल-छल को
फिर
चाहे तुम सामने लड़ो
"राम" के
या
उसी से लड़ो , उसी की आड़ में |

"राम"
ही सत्य है अंतिम
मेरा
तुम्हारा
सभी का
अंत में
"राम" नाम ही सत्य है !

Wednesday, December 15, 2010

लिखने का नैतिक दुस्साहस !

लिखने का नैतिक दुस्साहस !
करते है
कुछ
मेरे जैसे लोग
कुछ
तुम में से भी होंगे
बिना जाने
कि
कैसे एक एक शब्द
एक एक वाक्य
तुम्हारा पर्याय बन
जुट जाता है
उस रचना में
जो शायद
मेरा
या
तुम्हारा
मंतव्य ही ना था
सोचा ना था
इतनी दूर निकल जायेंगे
वो शब्द
और
इतना
विराट होगा
उनके अर्थों (अनर्थों !)
का फैलाव
कि
फिर समेट ही ना सकेगा
कोई कवि
कभी
उस भटकाव को
फिर
चाहे
कितने सुन्दर
अलंकारों
और
सधे छंदों में
रचते रहों
श्रष्टि पर्यंत
वेदों पर उपवेद
और
महाग्रंथ
या उनपर भाष्य
छद्म मनुष्यता
अश्प्रश्य ही रहेगी
चाहे पहन ले
कितने ही
शब्दाडम्बरों के
चमचमाते
चौधियाते
मुक्ता मणि |

Friday, November 26, 2010

तंज

२६/११ या कुछ और भी
इस तरह
उस तरह
एक दिन
हम केलेंडर के
हर पन्ने को
भर देंगे
अपने नपुंशक
मौन धारण
और
मौत पर
जश्न जैसे
जलसों से
जहा
फ़िल्मी सितारे
कवी , गायक
और
नेता
अपना मंच
ढूंढ़कर
बनाकर
बेचेंगे
शर्म और इंसानियत
और
माध्यम रूपी
भेडिये
लगायेंगे सेंध
भोले
भेडचाल के मारे
जनमानस के
थक चुके
टूट चुके
विश्वास में
बेच ही जायेंगे
जीने की एक वजह
और
अर्थी का
कुछ सामान
पता नहीं
रोज
इंसान मरता है
या
शर्म !

Friday, October 22, 2010

"जय श्री कृष्ण "

"भागवत गीता " के नित रसपान के बाद , अनायास ही अन्य संदर्भो में जब दुबारा झांकने का अवसर मिला तो पाया कि उन संदर्भो में झांकने कि द्रष्टि परिपक्वता की अगली पायदान पर थी. बहुत सोचा तो पाया कि जिस प्रकार जीवन कि घटनाओं और संस्मरणों से हम सीखते है ,वह हमारे परिपक्व होने की राह को दुष्कर और दीर्घ बना देती है, और वही जब "भागवत गीता " के आश्रय में रहते, हम मात्र किसी और पर घटित / कल्पित संस्मरण को सुनने मात्र से ही उसका सारभूत अनुभव सिद्ध कर जाते है, और ये सब और अनेक अन्य विभूतियों का संचय व पल्लवन / पुष्पन इतनी सहजता से जीवन वृत्त में घटने लगता है कि लगता है , महात्मा अर्जुन कि ही तरह हमें भी एक सारथी मिल गया है जो गाता जा रहा है "योग्क्षेम्यम्वाहाम्य्हम "|

जीवन कि कठिनाइया और क्लिष्ठातम मनोदशाओं और असाध्य्प्रतिता व्याधि / दुर्योग के निवारण कि इस सुगम नौका जिसके खेवनहार स्वयं श्रष्टा है, उस नौका में विहार करते हम कष्ट में हो यह नितांत असंभव है | बस इसी भावना को संप्रेषित करने का दुस्साहस और अकिंचन प्रयास किया है , आशा करता हू कि "भागवत गीता" के पठान / पाठन से अधिक से अधिक बंधू लाभान्वित होते ही रहेंगे |

"जय श्री कृष्ण "

भविष्य की नीव में

गीता का रहस्य
उसका कर्मवाद
प्रेमचंद की
पिसनहारी से
गोर्की के
आवारा मसीहाओं तक
बहुत सटीक
संदर्भित है
पता नहीं क्यों
हम
पुराने संदर्भो में
नए आयाम तलाशते है
शायद
हमारी
इसी तंद्रा ने
हर ली है
जीवन की सरलता
अनुभव बिना ज्ञान
और
ज्ञान बिना अनुभूति के
बना रहा है
दुरूह भविष्य
जिसकी बुनियाद में
जब कभी तलाशोगे
तर्क ही निकलेंगे

Thursday, October 14, 2010

तिलिस्मों के देश में

तिलिस्मों के देश में
अब तक
बस
तिलिस्म ही
बुने गए है
नींद और ख्वाब
जो
आजकल
मुफ्त मिलते है
बाटे जाते है
रोटी से सस्ती
कीमत पर
थोक की थोक
टीवी और समाचारों के मार्फ़त
एक पूरी पीढ़ी
जी रही है
बुना गया यथार्थ
और
बड़ी बेशर्मी से
जिसके विवेक
और
प्रज्ञा को
किया जा रहा है
कुंद
छिनकर
मासूमियत
सौपे जा रहे है
भोग
भीड़
और
भीत के बीज
जो बोने है
उन्हें
आगे
ताकि
"उनकी"
अगली पीढ़ी को
मिल सके
आदर्श गुलाम

आदमी का कद
छोटा होता जा रहा है
हर उपलब्धि के साथ
पढ़ाया जा रहा है
लिप्सा की पाठशालाओं में
वेतालों को
तर्क सिद्धि का पाठ

Monday, October 11, 2010

आयाम से परे ...हम - तुम !

आयाम से परे ...हम - तुम !
मेरी सीमाएं
मुझे
बांधती है
तुमसे
और
तुम्हे लगता है
कि
मैं
तुम्हारी सीमाओं में
बंध सकूंगा
किसी तरह
कभी

तुम्हारा
यही चाहना
खिंच देता है
हर बार
एक लकीर
जिसे पार करना
मेरी सीमा से परे है
और
जो
सिमटी हुई है
तुम्हारी
अपनी परिधि के
बहुत भीतर
आत्म परिचय
और
जीवन दर्शन से
सर्वथा अनभिग्य करती
तुम्हे

तुम
और
तुम्हारे बीच कि
वह
रेखा
मैं देख सकता हू
मगर
उसे मिटाने को
लांघनी होगी मुझे
तुम्हारी परिधि
और
तुम हो
कि
इसे उपलब्धि मान
आत्ममुग्ध
जा बैठी हो
किसी और ही बिंदु पर
जो
परे है
इस पूरे आयाम से
जिसका समाधान
शायद
मैं कर पाता
गर
तुम यहाँ होती / कभी / बस एक क्षण ...

Saturday, October 9, 2010

माँ तुम कैसी हो ?

माँ
तुम कैसी हो ?
आज
पूछना चाहा
मगर
फोन नहीं लगा
अगर
लग भी जाता
तो
ज्यादा बात नहीं होती
वही
हमेशा की तरह
कैसे हो बेटा
हम सब ठीक है
अपना ख्याल रखना
आदि
जुमले दोहराए जाते
माँ
मैं तुमसे
कहना चाहता हू
कई बाते
मगर
तुम उसे टाल दोगी
जानता हू
पूरा बचपन
और
जवानी
गुजार दी मैंने
तुम्हारे आँचल की
कवचनुमा छाव में
अब
किसी और से
उस गोद
उस स्नेह स्पर्श
आँचल
और
काँधे की
उम्मीद
सपना भर लगती है
फिर
भी बहुत घनी
है
अब भी
उन यादों की छाव
गुजारने को
सौ जीवन
हो चाहे
नरक सामान ...

माँ
तुम क्या हो
ये
सिर्फ मैं जानता हू
तुम भी
शायद
ये
ना जान पाओगी शायद

कितना अनोखा है ना
माँ-बेटे का
ये अनोखा रिश्ता
आज
जब अपने बेटे को
उसकी माँ की गोद में
मचलते
अनुनय करते
दुलारे जाते
देखता हू
तो
अनायास
उस स्राष्टिकर्ता पर
उसके अजब करतब पर
बस
हैरान होकर
रह जाता हू
अपने बेटू की
प्यारी "मम्मी" को
मै भी
कभी कभी
"माँ"
कह जाता हू !

Saturday, October 2, 2010

फैसले पर प्रतिक्रिया !

एक ठेलेवाला
गरिया रहा था
दो दिन की
रोजी के घान पर

एक बच्चा
चिंतित था
पढाई में
पिछड़ने पर
हालाकि
कुछ
बच्चे
खुश थे
के
खेल पा रहे थे
पास पड़ोस के
मैदानों में

शहर
बुझा बुझा
अनबूझा
कुछ
डरा सहमा लगा

समाचार
सधे सधे से रहे
पड़ोसी
सटे सटे से रहे

गाव
जो
बाढ़ से नहीं घिरे थे
या जो
अभाव से परे थे
शहर बनने की
प्रसव वेदना में
ये दर्द भी
सह रहे थे

मंदिर
सुबह की आरती
और
मस्जिदे
जुम्मे की नमाज
से ज्यादा
कभी
सरोकार में ना रही थी
पहले कभी इतनी
अचानक
हर गेरुआ पत्थर
और
दूब की चादरों वाली
हरी मजार
बेसबब
नहीं रह गयी थी

बाजार
ठन्डे थे
सौदे गर्म थे
दिल
सुलग रहे थे
मगर
अल्फाज
समझौतों से नर्म थे

ज्वालामुखी पर
पत्थर
तो
रख दिया जनाब
बड़ी खूबसूरती से
मगर
सुख चुके
रक्त के धब्बो
और
टूट चुकी
सदियों पुरानी
सद्भाव की जंजीर का
क्या है कोई जवाब ?

Monday, September 27, 2010

विलंबित मौन है न्याय पर , राम पर !

विलंबित मौन है न्याय पर , राम पर !
उन्होंने मस्जिद तोड़ी
ये कहकर के
वो उनका मंदिर थी
उन्होंने
मंदिर भी तोड़ दिया
राम का
आस्था का
लोकतंत्र का

अब
किसका न्याय होगा ?
करेगा कौन ??
किसके पक्ष में ??
राम के ?
आस्था के ??
या
लोकतंत्र के ???

अंतहीन प्रश्नों के
आधारहीन सिलसिले है
लाशो पर
कारसेवको
और
उनके विरोधियों की
कितने
कारोबार खड़े है
उनकी ही रक्षा में
ये
विलंबित मौन है
न्यायालय नहीं बताता
क्योकि
नहीं जानता
कौन जिम्मेदारी लेगा ?
राजी कौन है ??
जनता मौन है !
नेता मौन है !
मंदिर मौन है !
मस्जिद मौन है !

आखिर इस फसाद का
व्यापारी
खरीददार
वो
गद्दार कौन है ???

लोकतंत्र बनाम जवाबदारी

वो तो चाहते है
के
मै लडू तुमसे
और
वो जीत जाए
उनका काहिलपन
उनकी लाचारी
कैसे भी
छुप जाए
चाहे मंदिर जले
मंदिर टूटे
अस्मते लूटे
या
गिरे लाशें
उन्हें
करने है
नित नए तमाशे
तुम देखो
तुम्हे क्या करना है
मै
अपने विवेक पर हू
उन्हें लगने दो
के
उनकी ही टेक पर हू ...

उनकी ही तर्ज पर
कल
कुछ तुम बोल देना
मै सुन लूंगा
मै
गर कुछ कह भी दू
तुम भी भूल जाना
इन्हें आसान है
इनकी तर्ज पर हराना ..

अब
न्यायालय
और चुनाव आयोग
निरपेक्ष नहीं लगते
तो क्या करे ?
व्यवस्था ना सही
अव्यवस्था के ही साथ
ईमानदारी ना सही
भ्रष्टाचार के हाथ
इस अन्धकार युग से
लोकतंत्र की नैया
कैसे भी खेनी है
वो जो कर चुके
उसकी भरपाई
हमें भी देनी है |

Tuesday, September 21, 2010

जंगल का सलीका

मेरे एक सवाल पर
बौखलाकर
उसने
सौ सवालों के
जवाब ही दे डाले ..

अकेले चने ने
भांड फोड़ा
क्योकि
उसने
ये कहावत
नहीं पढ़ी होगी

उसने
तेवर दिखाए
विरोध के
और
व्यवस्था
बदल गयी

वो
जानता था
एक वोट की कीमत
उसने
विरोध के नाम पर
कभी
आत्महत्या नहीं की

समूह में रहना
शेर की मज़बूरी थी
ये जानकार
हिरनों ने
कभी
अकेले शेर को
नहीं छेड़ा

जंगल
बढ़ता ही गया
उनके विरोध के बाद भी
वो
जो जंगल के नहीं थे
वो भी
जंगली हो गए ...

उस जंगल में
वैसे तो
हर जबान रहती थी
मगर
आपस में बात
सिर्फ
नोटों में होती थी
विविधता में एकता
उस जंगल की
ख़ास बात थी

Wednesday, September 15, 2010

"नारी" होने की परिभाषा ...

वो
ना कल मोहताज थी
ना आज है मुफलिस
किसी मर्द ने ही
बेचे
ख़रीदे होंगे
उसके जेवर
उसका बदन
फिर
उसके बचे खुचे
वजूद को
मिटाने के लिए
ये चाल भी
खूब चली गयी होगी
औरत
क्या सिर्फ
औरत के हाथो
यू फिर फिर
छली गयी होगी !

आदमी खूब जानता है
वर्चस्व के पैतरे
त्रिया चरित्र
जैसे जुमले
आज
जड़ों से
उखाड़ चुके
नारी की
स्वाभिमान की अभिलाषा
उसे ही
फिर गढ़नी होगी
एक
"नारी" होने की परिभाषा ...

Monday, September 13, 2010

"नारी" और कितने छिद्रान्वेषण

नारी
एक छेद भर नहीं है
के
तुम उढेल दो
अपनी कुंठाएं
और
पूर्वाग्रह

नारी
बिस्तर भी नहीं है
के
तुम बिछा दो
ढक दो
तप्त
नंगी
सच्चाइयों को

नारी
खिलौना नहीं है
के
बदलते रहो
तोड़ते रहो
अपनी समझ के
बुढ़ाने तक

नारी
शराब नहीं है
जो
परोसी जाए
गलीज सौदे के एवज

नारी
सीढ़ी नहीं है
के
घिसती रहे
पत्थर होने तक !

नारी
एक दिल है
आत्मा है
आस्था है
स्तम्भ है
जिस पर टिकी है
खोखली इंसानियत
जिसकी अगुवाई
सिर्फ
पुरुष करते आये है ..... अब तक !

Thursday, September 9, 2010

मानव का ईतिहास

मानव का ईतिहास
मानवता के ह्रास का भी
दस्तावेज है
इसे झूठ के पुलिंदो
और
अनगिनत लाशों से
छुपा दिया गया है
करोड़ो शब्दों की
सुखी घास के पीछे
जो सुलग उठती है
सच और साहस के
एक झौके से
जो
पैदा होता है
भूख और युद्ध की कोख से
जिसमे जल जाते है
काले पड़ जाते है
कई चहरे
जो पूजे जाते थे
जलसा घरों से
न्यायालयों तक ...

अगर सच ही पढ़ना है
तो
कहानी या कविता पढ़ना
वरना वक्त बिताने के लिए
ईतिहास अच्छी चीज है |

Wednesday, September 1, 2010

"सत्यम शिवम् सुन्दरम"

"सत्यम शिवम् सुन्दरम " ये तीन शब्द हमेशा मानस में मथते रहते है , और भारतीय सनातन मनीषा में इनका गहरा लक्ष्य या सरोकार कला से रहा है , या यू कहे कि समस्त जगत शिव पार्वती का क्रीडांगन ही है तो जीवन के वृहत्त पटल पर सूक्ष्म से लेकर अत्यंत व्यवहारिक चेतन सृष्टि तक , समस्त सार ही इन शब्दों में समा जाता है |
इन शब्दों का अलग अलग अर्थ तो बहुत व्यापक हो ही सकता है परन्तु इस विन्यास में ये सर्वाधिक सार्थक बन पड़े है | "सत्य ही शिव है , शिव ही सुन्दर है !" जैसा कि सामान्यत: भावार्थ किया जाता है , इसे भी सहज ही समझ पाना और आत्मसात कर पाना वैसे ही बहुत कठिन है फिर इसके ना ना अर्थों और व्याख्याओं का अनंत सिलसिला मिल सकता है |
सत्य बिना लाग लपेट के शुद्ध आचरण का आग्रह है और यहाँ प्रवंचना की कोई गुंजाइश है ही नहीं सो शिव को साक्षात करता है सत्य और केवल इसी रूप में दर्शनीय हो सकता है , सो यदि कोई ईश्वरीय सत्ता के साक्षात करना चाहता है तो उसका आधार व निष्कर्ष सत्य के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता | "सत्य ही शिव है ..." ये आख्यान हमारी श्रद्धा और विश्वास को अंतिम परिणिति देता है , वैसे तो सत्य प्रथमतया एक कल्पना या अवधारणा ही होता है , फिर उसका चाहे कोई नाम रख लो , मगर वो सत्य की ओर ही ले जाता है और वहा हमारा शिव सत्य से एकाकार हो जाता है और हम नि:संदेह शिव से एकाकार हो चुके होते है , बहुत पहले ही , तो सत्य तक यात्रा का लक्ष्य है शिव |
शिव की सहज व्याख्या करना अपने आप में एक अक्षम्य धृष्टता होगी , सो उनके पावन चरणों में श्रद्धा के फूल चढ़ाकर उन परम सनातन को प्रार्थना से ही प्रसन्न करना होगा , मगर प्रार्थना के मूलभूत नियमों में सर्वोपरि , पवित्रता को मासूमियत को सदैव स्मरण रखना होगा |ईमानदारी , स्वाभिमान , नि:स्वार्थता , त्याग कितने ही रूपों में कई तरह से ये प्रार्थना नित्य घटित होती है और जब यह घटित हो तो इसके साक्षी बने .... वही मार्ग है कैलाशवासी शिव के चरणों का |
"शिव ही सुन्दर है " , नाना प्रकार के आकर्षणों से बना ये जीवन वृत्त , इसमे पिता शिव , माँ पार्वती के साथ क्रीडा करते है , जगत कि स्रष्टि और लय ही नहीं करते , मध्य में विपुल सौन्दर्य और असीम वैविध्य का आमूल सर्जन भी करते है | उस घटित, अघटित , स्थूल एवं सूक्ष्म सौन्दर्य को कई तरह पुन:प्रस्तुत किया गया है , कई कई कलारूपों में और नाना भाति प्रयास जारी ही है | हर कण और हर नवसृजन हमें उसी कि झांकी देता है , जो शिव है जो सत्य है , बस हमारी दृष्टि की सीमा और प्रस्तोता कि मर्यादा उसे एकायामी या बहुआयामी तो बना पाती है पर पुर्नायाम तो शिव में ही मिलते है|
अंत में "सत्यम शिवम् सुन्दरम !" कह कर यही तक कह सकूंगा , उसके बारे में जिसे वेद भी "नेति , नेति .." कह चुके है |

Thursday, August 26, 2010

हे माँ हिंदी भावभरी !

हिंदी का मान हम है
हिंद का मान है हिंदी
इतनी सी आस और है
विश्वभाल दमके ये बिंदी

अपनी भाषा अपना गौरव
जाने कब के भूले तुम हम
गैरों को पग पग पे नवाजा
अपना मजहब भूले तुम हम

कैसे हिन्दी का परचम लहरे
कैसे साथ साथ तिरंगा फहरे
हिंदी की सीढ़ी पर कितने पहरे
अलगाव तुष्टि के घाव है गहरे

इसमे ही बसा भारी जनाधार
कितनो की कश्ती का पार
आज मातु है स्वयं मझधार
कहने को जन गण भले अपार

धिक्कार करो इस जीवन पर
यदि निज भाषा का मान ना हो
अधिकार करो उस सत्ता पर
जिसे निज गौरव का भान ना हो

सजीव शब्दों का संधान करो
निज भाषा का अनुसंधान करो
फिर धरो प्रत्यंचा भावो की
सब सुलभ लोभ का दान करो

हो कर्मवीर तुम हो रणधीर
क्यों काँधे को झुला रहे
क्यों शिथिल हुई तनी भवे
क्यों भविष्य को रुला रहे

निज घर से निज आँगन से
तुम माता का आह्वान करो
हे मातृभाषा ! हे भावभरी !
आओ ! हो प्रगट, हिंद उद्धार करो !

दुश्मन तेरा शुक्रिया !

आज बहुत दिनों बाद
फिर चेतना लौटी है
मैं भी लौटा हू
चेतना में

बेसुध
बहुत लड़ा
अँधेरे की बंदिशों से
विश्वास
और
श्रद्धा की खडग भी
छूटने लगी थी..

तभी
इश्वर स्वयं
खडग बन
ढाल बन
खड़े हो गए
जीत हार का
अब मै क्या करू...

दे रहा हू दुवाए
दुश्मनों को
के
उन्हीने ही सही
ईश्वर का
दीदार तो करा दिया !

Monday, August 23, 2010

जीवन की पाठशाला में

क्रोध की सीमा
और
मर्यादाओं के भंग तक
रोज तमाशों से
गुजरता हु
भोगता हूँ
अपने ही
उपेक्षित व्यवहार से
उपजी वित्रश्ना
और
दुर्व्यवहार को |

सीखता हू
सोचता हू
और कितना
कब तक
सीखना
सहना
बाकी है
जीवन की पाठशाला में |

Monday, August 16, 2010

१६ अगस्त मनाओ

१६ अगस्त मनाओ

आज थोड़ा सड़को पर निकल जाओ
जहा से कल हुजूम निकला था
तथाकथित देशभक्तों का
सड़क के किनारे पड़े ,
नाली में
झंडे उठाओ (अगर कर सको )
फिर देखो
उस मैदान की तरफ
जहां
कल सभा हुई थी आम
जिसमे ख़ास लोग आये थे
उस मैदान में
कल तक
बच्चे
फूटबाल खेला करते थे
अब
पूरा मैदान गड्ढों से भरा है
भीतर कीचड़ और कचरा भरा है
देखो
सफ़ेद खादी पहने
जो गुंडा
कल
झंडे का सरेआम
अपमान कर रहा था
आज वसूली कर रहा है
पुलिसवाला
जिसकी कमाई
कल मारी गयी थी
ड्यूटी और खातिरदारी में
जिसकी भूक और नींद भी गयी थी
आज फिर
चुस्ती से चौराहे पर अडा है
लाल बत्ती पर
पहरा कडा है
आज
भले कही बम फूटे
चाहे
कोई घर लूटे
इनसे आस मत रखना
मगर
भीतर
कही भारत को ढूँढना
पोछना
सम्हाल कर रख देना
क्योकि
बीते कल
बहुत अपमान हुवा है
मेरे भारत का
लालकिले से चौराहे तक
(शहीदों और सुभाष की दुखती आत्मा को श्रद्धांजलि सहित..जय हिंद !)

Sunday, August 15, 2010

आज

आज सिर्फ उनको नमन करो
आज बस उनकी बात करो
आज शिकायते ना करो
आंसू भी ना बहाओ
दो फूल श्रद्धा के
हाथों में उठाओं
उस ध्वज पर चढाओ
जो छत्र बन तना है
जो
लोकतंत्र का प्रहरी बना है
आज
उनको मत कोसो
जो
हमें धकेलने में लगे है
पीछे
आज
उनको नमन करो
दो फूल
कृतज्ञता के
उन्हें भी चढाओ
जिन्होंने
शीश अपने
अर्पण किये है
जिन्होंने
बलिदान कितने दिए है
आज
आपनी समस्याओं पर
शोक मत मनाओ
आज
विडम्बनाओ को
वर्जनाओं को
भूल जाओ
दो फूल
उन्हें भेट करना
जो
असत्य से लड़े है
जो
संविधान के
पक्ष में खड़े है !

ओ भारत माता !!

रोज सवेरे पूरब तेरे
सूरज नमन को आता
तू है मेरी जन्म भूमि माँ
तू हम सब की माता
मेरी भारत माता , ओ मेरी भारत माता !
भारत माता , ओ भारत माता !!

हम करे वन्दना तेरी
जग तुझको शीश नवाता
हम करे प्रार्थना तेरी
जीवन की राह अँधेरी
जो आशीष तेरा मिल जाता
पथ में प्रभात हो जाता
ओ भारत माता, ओ भारत माता!!

यहाँ जग में विशाल हिमाला ,
जिसने गंग जमन को पाला
इसकी मिटटी में सोना
इसमे मिल कर ही खोना
जो गोद तेरी सो जाता
मुझे स्वर्ग यही मिल जाता
ओ भारत माता, ओ भारत माता!!

यही रची स्रष्टि की गाथा
कहे उन्नत कर कर माथा
तेरा ध्वज इतिहास उठाता
हर पग भविष्य को जाता
तू वेद संस्कृति दाता
तेरा पुत्र जगत का भ्राता
ओ भारत माता, ओ भारत माता!

(अपने लड़कपन में लिखी ये रचना आज सब से बाटते हुवे बहुत हर्ष हो रहा है ! सभी मित्रों , शुभचिंतकों व स्नेहीजनो को भारत वर्ष के स्वंत्रता दिवस पर्व की हार्दिक हार्दिक बधैया ! इश्वर हमें सन्मार्ग पर आगे बढाए यही कामना करता हु ...शुभम अस्तु !)
तरुण कुमार मोहन सिंह ठाकुर
इंदौर से

Thursday, August 12, 2010

जब तुम घर नहीं होती

मेरा मन भी बैचैन रहता है
अस्थिर भटकता हूँ
जगत में
मन के सुने वन में
अजीब से
ख्यालों से
जूझता हुवा
इन्तेजार करता हु प्रिये!
के कब
तुम्हे लौटा लाऊ
अब तो
बच्चो की याद भी
बहुत आती है
और
उनकी छुट्टिया भी
ख़त्म होने को है
सोचता हु
इस इतवार
किसी बहाने
तुम्हे लिवा लाऊ
मगर
कुछ मजबुरिया है
अब
तुमसे क्या छुपा है
गर्मियों के ये
अंतिम सप्ताह
यानी पानी की किल्लत
तुम यहाँ होती
तो हम तुम रातों को
जाग रहे होते
दो घड़े पीने के पानी के लिए
और
तुम हलकान रहती घर पर
गर्मी के मारे |
बड़का तो चलो
अब गर्मी सह लेता है
मगर छुटकी
उसे कैसे सुलाती तुम
फिर
इस विकराल समस्या
के अलावा
कई बड़ी छोटी
समस्याए है |
खडी बैठी
के एक एक कर
हल कर तो रहा हूँ
मगर
कभी चादर छोटी पड़ जाती है
कभी समस्या फ़ैल जाती है
इन्हें समेटने सहेजने और सुलझाने में
पूरा दिन
उलझता हूँ
फिर
रसोई में भी लगता हु
कच्ची पक्की खाकर
गुजारा कर रहा हु
समझ ही नहीं आता
जी रहा हूँ
या मर रहा हु
हां पर
इन्तेजार कर रहा हु
तुम बस
पहली खबर पाते ही
बिस्तरा बाँध लेना
मैं अगली गाडी से
पहुच जाउंगा
इस रविवार डार्लिंग
तुम्हे
जरुर लिवा लाऊंगा |

Tuesday, August 3, 2010

वो....शिखर !

जब मैंने
पहाड़ पर चढ़ने के लिए
सीढिया बनाना
शुरू ही की थी
उन्हें लगा
मुझे
मदद चाहिए होगी
फिर
वो
मेरी जिंदगी में आयी
कई वादों
और
नेक इरादे के साथ
मगर
उसका काम
आसान भी था
मुश्किल भी
आसान यू
के उसे नीचे ही रहना था
ऐसी कोई
शर्त तो नहीं थी
मगर
यही था
जो उसके लिए
सबसे आसान
और
सहज स्वीकार्य होता
ऐसा मान भी लिया गया
उसे
अपना नया काम
बहुत भाया
उसने
बड़ा जी लगाया
मैं
रोज ऊपर जाता
नयी सीढिया
तराशता
अपने लिए
अपनो के लिए
मैं
रोज रात
नीचे लौटता
जब
अन्धेरा हो जाता
सुबह तक
सोया रहता
जुल्फों की
घनी छाव में
चाँद को
देखते हुवे
जो
बहुत हँसीं हुवा करता था
बेशक
उन दिनों
सुबह
मेरा जी तो नहीं चाहता
मगर
वक़्त की धूप
मुझे
कोड़े मार मार कर जगाती
भेजती
ऊपर
जहा
कल
मैं अपना काम
बाकी छोड़ आया था

आज
कई मंजिलो ऊपर
रोज
चढ़ना उतरना
हो नहीं पाता
थक जाता हूँ
वो भी
अब परेशान रहती है
जुल्फों की छाव भी
अब
कम घनी हो रही है
चाँद
मुरझाने लगा है
मेरे
अपने
जो
चढ़ सकेंगे
शिखर पर
मेरे बाद
कही आराम से
उसे सताने लगे है
वो चाहती है
मैं उसे भी
साथ ले चलू
गोद में उठाकर
या
नया शिखर रचू
उसे साथ लेकर
मैं
अनिश्चय में
कभी
उसे
कभी
शिखर को देखता हूँ
जहा
बस
कुछ सीढियों
का फासला बाकी है
फिर
महसूस करता हूँ
उसके
और
मेरे दरम्यान
दुरी बढ़ती जा रही है
शिखर
नजदीक आता जा रहा है
वो
दूर होती जा रही है !

Wednesday, July 28, 2010

मार्केटिंग

थोड़ा श्रम
बहुत सी शर्म
और
सारी इंसानियत को
बुझे हुवे
आत्मविश्वास की राख में
लपेट कर
बेचने की कला है
"मार्केटिंग "

"उत्तरदायित्व"
नीचे की ओर
"श्रेय"
ऊपर की ओर
सहज
प्रवाहित है |
स्वीकार्य
ओर
अपरिहार्य
की लड़ाई में
विवेक को
तिलांजलि देना
शोर्य
ओर
समर्पण है जहा |

"ग्राहक देवता है "
जैसे जुमलो के बीच
"आज नकद कल उधार "
जैसी पंक्तियों से
जंग लगे पतिलो
ओर दीमक खायी
लकड़ियों वाली दुकाने ,
अब
सिमटती
सहमति सी ,
शहर के
पुराने
उपेक्षित
कोनो में ...
पड़ी खाद बन रही है |
बुढा गए
घाघ दुकानदार
चकाचौध
ओर
प्रचार
की गर्मी से
झुलसे
तपे
अंतिम साँसे गिन रहे है ...

बाजार के
परिचित
ओर
अपरिचित
कोनो में
बहुराष्ट्रीय
प्रतिष्ठित
"ब्रांड" का कब्जा है ...
जिसे
अतिक्रमण कहना
अशोभनीय
ओर
अनागरीय होगा !

किसान
और
साहूकार
का बेटा
जहां
मजदूर बनकर
चाकरी
करने को
लालायित है |
चमचमाती गाड़ियों ,
उन्मुक्त संस्कृती ने
चौंधिया दी है
युवान आँखें
जो
देख सकती थी
स्वदेश
ओर
सुदेश
से कही आगे |

सेक्स ओर भोग
परोसा जा रहा है
खुला ...
सरकार !
बना रही है
व्यवस्था को
लचीली / लिजलिजी
जो
वैसे
कभी
नहीं बदली
कितनी आत्महत्याओं
आंदोलनों के बाद

अब
लोकतंत्र
और
धर्मनिरपेक्षता
के मुखौटे
बेचते
दलाल ...
दाल ओर चीनी
के सहारे
भाग्यविधाता
बन
सरकार बदलते है !
विचार
विचारधाराएं
बदलते है !!
जैसे
पूरे आधे नंगे मोडल
उतारे हुवे
कपडे बदलते है

अरे
शर्म बेचकर ही
सब हासिल है अगर
तो
सब हासिल चुका कर
एक पल का सुकून
ओर
खुद से आँख मिलाने
की हिम्मत
खरीद कर बताओ
फिर
फैसला करना
वक़्त से ये होड़
कितनी
महंगी पड़ी ???

धर्म ,
इंसानियत,
नैतिकता
और
भावनाओं तक
सब
दाव पर
लगा बैठा है
युग
और
वक़्त
ध्रतराष्ट्र बना
प्रतीक्षा में
बैठा है
मौन
ताकि
सुन सके
महाभारत से
ठीक पहले
पांचजन्य का स्वर
ओर
कृष्ण की बानी
किसी
संजय की जुबानी ...

Saturday, July 3, 2010

सच की बोली !

आज प्रेरणा चाहिए
मुझे भी
और समय को भी
संचित सभी
चुके विवेक
और
रच चुके चूहें
इतिहास |

ठिठोली बन गया
ज्ञान का जरिया
उपकरण सारे
झुनझुने बन
समझ का
मखौल बना चुके

अब सब्जी वाला
भी सुर में लगता है
उससे जो गाते है
गिद्धों और सुवरों
की नैतिकता
भारी पड़ रही है
मानवीय मनीषा पर

यशश्वी धर रहे है
चरणरज चोरों की
सर माथे
धूप सबको दिखती है
सूरज
कही दिखता नहीं

महक का फुल से सरोकार
ख़त्म कर चुके
भावनाओं तक के
ओंछे दुकानदार
अब सिर्फ
सच बचा है
जिसको
खरीदने की औकात
अब तक तो
दिखी नहीं
है कोई !!!
जो सच ख़रीदे ....
खुद बिककर !
बोली एक !
बोली दो !!
....

Thursday, July 1, 2010

सरस्वती-पुत्र, एक विडम्बना !

ये वक़्त भी
गुजर जाएगा
फिर नया कोई
दौर आयेगा |

तब लिखूंगा
कविता
देशकाल
और
समाज पर

मिल जाए
पुरस्कार ,
कुछ राशि ,
रोयल्टी ...वगैरह |

बिटिया का ब्याह
बेटे का ठौर
क्या
कवि की
कोई जिम्मेदारी नहीं ?

साहब !
आप तो
समझ ही नहीं सके
के क्यों
लिखते है
कवि छद्म नाम से ?

क्यों ?
कोई कवि
आगे नहीं चलता
किसी
जनांदोलन में ?

क्यों
प्रसंस्तिया ..
शोक / विरह गीत
और
श्रृंगार रत
रहता है सदा कवि ?

क्यों
उसके अश्रुओं से
नहीं धुलती
उसकी अपनी स्याही
या
क्यों नहीं जल उठत़ा
कागज़
उसकी ज्वलंत लेखनी से ?

क्यों
आखिर क्यों ?
सरस्वती-पुत्र कहलाता
बैठा है
हारा
नाकारा
निस्तेज
अपनी ही माया में
मस्त
सहता क्लेश ,
नियोजित कष्ट !!!

Monday, June 28, 2010

थूंक के छींटे ..अगली पीढ़ी तक !

उसने जब
सड़क पर थूका
बेलिहाज
बेअदब
शायद
बेसबब नहीं था |
रोज
सैकड़ो हजारों
की ये हरकत
जिसमे
कुछ अजब नहीं था ,
खटकी थी
अटकी थी
चंद निगाहों में |

जिन्हें
जीवन
गिनती सा सरल
और पहाड़े जितना
कठिन लगा होगा |
..अब तक |

"मास्साब" वो आप थे ?
नहीं ! नहीं !
कोई हमशक्ल रहा होगा |

Sunday, June 27, 2010

क्रान्ति !!! , कब ????

क्रान्ति के पूर्व
होती है छटपटाहट
भीतर
कही कोने में
नक्कारखाने में
तूती की तरह
जैसे
रात के अँधेरे में
करते हो शोर
ढेर सारे झींगुर
मगर ...
क्रान्ति नहीं होती
लोग जागते है
या
जब अलसभोर हो
या
जब सिंह दहाड़ते है
निकट ,
निपट,
निर्भीक !

Monday, June 21, 2010

मेरी अपनी एक डगर है

कोई साथ चले ना चले
मुझे भीड़ से क्या लेना |
मेरी अपनी एक डगर है
मुझे भीड़ से क्या लेना ||

भीड़ मिटा देती स्व को |
भीड़ बड़ा देती भव को |
मै लिए सहज समभाव |
मुझे भीड़ से क्या लेना ||

भीड़ फिरा देती है सोच |
जगा कर उन्मादित जोश |
रुग्न ज्वर सी वेदनामय ,
मुझे भीड़ से क्या लेना ||

कसमसाता विवेक मुट्ठियों में
लहराता ज्यों सागर पर फेन |
जो अबूझ पहेली , हो स्वयं प्रश्न
मुझे भीड़ से क्या लेना ||

मेरी अपनी एक डगर है
मुझे भीड़ से क्या लेना ||

Friday, June 18, 2010

याद है मुझे कब पिछली बार हँसी थी वो

याद है मुझे कब पिछली बार हँसी थी वो ,
मेरी ही किसी बात पर बहुत हँसी थी वो |
जाने तब क्या सोच कर बहुत हँसी थी वो ...
खैर जो भी हो मगर क्या खूब हँसी थी वो |
हंसते हुवे पल्लू से ढँक लिया था चेहरा
आँचल के पार बिखर गयी ऐसी हंसी थी वो |
मैं भी हंसा था साथ था हाथों में उसका हाँथ
लेकर हाँथ मेरे साथ सारी रात हँसीं थी वो |

नहीं भूलती उसकी खनक आज भी सुनता हूँ
किसी घुंघरूं किसी पायल कि सी हँसी थी वो |
रूप और भी उजास से रंगों से भर गया था उसका
कोई भूलना भी चाहे ना भूले ऐसी हँसी थी वो |

एक अहसान है मुझपर उसका चुकाए नहीं चुकता
दिल उदास था उसका थी परेशान फिर भी हँसी थी वो |
उसकी हँसीं पर वरना क्यों नज्म लिखता यु ही तरुण
सारे अपने गम भुला के सिर्फ मेरे लिए हँसी थी वो |

गाँधी

गाँधी ,
एक शब्द है ,
जिसमे आत्मा भी है |
गांधी ...
एक विचार
भर नहीं है |
एक समस्या बन गया है !
उनके लिए ,
जिन्हों ने ,
सहज ही साध रक्खे है '
सत्ता के सारे सूत्र |
उनकी पीढिया ,
पहन रही है ,
गाँधी की उतरन |
बेशर्म होकर ,
जिन्होंने ,
गरीबो की झोपडियो में ,
झुग्गियों में ,
किलेबंदी
कर रक्खी है |
उस सोच के खिलाफ ,
जिसका नाम ,
गाँधी है |

अकल बड़ी कि भैस बड़ी ?

अकल बड़ी कि भैस बड़ी ?
इसी सोच में अकल पड़ी
भैस खडी पगुराएगी
अकल कि चल ना पाएगी
सींग उठाए भैस खडी
पूंछ उठाए भैंस खडी
गोबर देगी या दूध अड़ी
पड़ी चौराहे अकल सड़ी
भैंस बिक गयी खडी खडी
दूध पीकर जो अकल बड़ी
भैंस से जाकर जुडी कड़ी
कैसे अहसान चुकाएगी
भैंस समझ ना पायेगी
अकल बीन बजाएगी
भैंस खडी मुस्काएगी
जो भैंस पानी में उतर गयी
रह जायेगी अकल खडी
अकल के पीछे भैंस पड़ी
जमीन जाकर अकल गडी
चारा बन उग जायेगी
भैंस उसे चर जायेगी
अकल लग रही हरी हरी
भैंस देखकर डरी डरी
भैंस देखकर अकल झड़ी
भैंस बड़ी कि अकल बड़ी ???

Wednesday, June 16, 2010

आपस की बात Day 1

दिल तो है दिल
दिल तो पागल है
दिल ही तो है
ये दिल ना होता बेचारा
आदि
ना जाने कितने जुमलो से
सताया दिल को
फिर
दिल टूट गया एक दिन
तो रोना लेकर बैठे
दिल तोड़ने वाले
दिल तोड़के जाते हो
टूटे हुवे दिल से
वगैरह वगैरह
अरे भाई
दिल एक है
और कीमती भी
व्यस्त भी
और
तुम्हारे कारण
त्रस्त भी
उसे अपने कारण नहीं
तुम्हारी गलतियों के कारण
करवाना पड़ते है
तीन तीन बाइपास
और
तुम्हारे चक्कर में बेचारा
हो जाता है
नापास
तुम तो झट कह देते हो
यार हार्ट फेल हो गया
अरे कभी
किसी को
ये कहते सुना है
कि हमारा दिल अव्वल आया है
लो मिठाई खालो
नहीं ना
तो हमसे कुछ नुस्खे ले लो
मुफ्त नहीं मिलेंगे
यहाँ ससुरी सबको
मुफ्त की बड़ी चाट लगी है
अभी मुफ्त दे दूंगा
तो कल कौन पूछेगा
तो भाई
कीमत मैं बाद में वसुलुंगा
आखिर में ..
पहले नुस्खे नोट कीजिये
नुस्खा नंबर एक
बन जाइए नेक
ना की घुटने टेक
भाई भीतर के स्वाभिमान को
जिलाए रखिये
और
इसके लिए
एक शौक जरुर पालिए
क्या कहा
शौक नहीं पालते
पालना भी नहीं चाहते
तो
एक कुत्ता पाल लीजिये
क्या कहा
कुत्ते से एलर्जी है
कुत्ता काट लेता है
कुत्ता गन्दगी करता है
लीजिये
अभी नुस्खे देना
शुरू भी नहीं किया
और नखरे शुरू

चलिए नुस्खा नंबर दो
अपना नंबर दो
हां हां
अपना नंबर दीजिये
और मेरा लीजिये
अगर लड़का है
तो लड़की को
आंटी है तो अंकल को
कवि है तो श्रोता को
कवि , कवि को भी दे सकते है
क्या कहा
आपने दिया है
और आप ज्यादा परेशान है
किसको दिया
बीमा वाले को
बैंक वाले को
रिकवरी वाले को भी
अरे बाप रे उनको भी
चलिए छोडिये
आपकी समस्या
ज्यादा गंभीर है
आप बात ही
पूरी नहीं सुनते
कान की दवा आँखों में
आँखों की वहा
जाने क्या क्या करते है

नुस्खा नंबर तीन
हो जाओ तल्लीन
हां
किसमे
नहीं दारु बिलकुल नहीं
सेक्स भी योग्यता अनुसार
लिहाज शर्म और एहतियात के साथ
मैं तो
ध्यान की बात कर रहा हूँ
ध्यान दो बाबा
विषय से मत भटको
अब तुम क्या करने लगे
बाबा रामदेव खोल कर बैठ गए
अरे बाबा वो योग है
मैं ध्यान
ध्यान कि बात कर रहा हु
रुको
इससे पहले कि तुम और किसी
बाबा का चैनल
लगा लो
मैं सबसे आसान
एक दम घरेलु टैप का
नुस्खा बताता हु

दिल लगाओ
जी हां दिल को
काम में लगाओ
वो काम नहीं
अच्छा एक दिन
गलती से
सुबह उठो
जोगिंग सूट पहनो
और सड़क पर
गार्डन में
पार्क में
घूम आओ
तुम्हे दिल लगाने के
कई सामान मिलेंगे
और
मौके भी
तो क्या कहते हो
मिले सुबह
कहा पार्क में या
मैदान में
अजी साहब
सुबह जल्दी जागने
और भागने वालो से
दिल लगाइए
आपका दिल नहीं टूटेगा
और
फेल तो क्या
सप्लिमेंटरी भी नहीं आएगी
पास कराने की
हमारी गारंटी है साहब
अब लगे हाथो
फीस कि बात भी
कर डालते है
तो
जनाब
अब तो मुस्कुरा दो
आहा
ज़रा और , ज़रा और
ये हुई ना बात
तो ये थी आज की बात
क्या कहते हो
होती है
कल फिर मुलाक़ात
लिखना जरुर
कैसी लगी
ये
आपस की बात

Tuesday, June 15, 2010

लो सखी आया झूम के सावन !

लो सखी आया झूम के सावन !

गिरी बूंदे "खन खना खन"
मन के आँगन ,
पसर गया पानी राहो पे
भींगी छत भरी छाजन |
इसी की राह तो तकती थी
आये झूम के सावन|
सखी देख इतरा के
वो आया झूम के सावन ||

लता भी , झाड , झाडी ,
घास ,पत्ते, मन
भिंगो कर हर कली
हर अनछुआ तन |
सिंगार अवनी का बना ,
ज्यों कृपण को धन
सहेजू तो कहा? कैसे?
हर कतरा मधुर कण-कण ||

इतराऊ भी इठलाऊ,
बजा पायल सजा कंगन
लिवाने अबके गौने में
जैसे आये मेरे साजन ||
एक बूंद तो देखो कैसे
होठो पर गिरी बेहया बैरन
बन पिया का प्रेम चुम्बन
जो उडी संग ही ले गई मन ||

मंदिर भी भींगा ,भींगी मस्जिद,
"बिगड़ बन बन" "बिगड़ बन बन" |
मानो गा रही बूंदे भी
"जन - गण - मन" हां "जन - गण - मन"||
जैसे बजते हो नुपुर
"छनक छम छम " "झनन झुन झुन "|
तबले पर थाप हो जैसे
"तिगड़ धिन त़ा " "तिगड़ धुन धुन"||

इतना ही तो माँगा था हरिया ने
हो नत , कर नमन भींगे नयन |
चिड़िया ने माँगा दाना-दुग्गा,
माँगा एक नीड ना माँगा ऊचा भवन ||
तू श्याम हो जा ,श्याम से घनश्याम होजा
ओ रुपहले नीले गगन |
तेरे स्वर में तर बतर हो "तरुण "
भीजता ,
सीजता,
शीतल ,
मगन ||

रहिमन पानी राखिये

रहिमन पानी राखिये
बिन पानी सब सुन
पानी गए ना गुजरे
अप्रेल मई और जून

रहिमन पानी राखिये
जाने कब आये मानसून
पेपर , टीवी रेडियो कहे
कमिंग सून , कमिंग सून

रहिमन पानी राखिये
बिन पानी सब घून
प्यासी जनता पी रही
एक दूजे का खून

रहिमन पानी राखिये
बीत ना जाए जून
बिन नहाए बिन धोये
सब लागत है कार्टून

रहिमन पानी राखिये
खाकर सत्तू नून
धूप महंगाई बढ़ रही
जनता गयी है भून

रहिमन पानी राखिये
पानी रहा सुखाय
नैनो का नीर भी पी गए
देखो सावन कब आय
अब आया के तब आय
अब आय के तब आय
रहिमन जैसी निभ रही
जब तक निभे निभाओ
दुवा करो हे दाता !
अब तो द्वार गाँव भिंगाओ
अब के बदली बन
गगन पर ऐसे जम जाओ
के फिर
हम तुमसे कहे !
बस बाबा अब जाओ !

आशा करता हूँ
मेरी पाती पढ़
तुम जरुर आओगे
ककड़ी भुट्टा लाओगे
और नहीं सताओगे
सबके पिया कहलाओगे
तभी मल्हार सुन पाओगे
तो अंत में
रहीम को सादर नमन
और
चार पंक्तियों से
करता हू बात ख़तम

रहिमन पानी राखिये
सब पानी के मजमून
सब तेरे जिलाए जी रहे
सब तेरे है मगनून!
सब तेरे है मगनून!!
सब तेरे है मगनून !!!

Monday, June 14, 2010

मेरी कविता , तुम्हारी कविता

मेरी कविता , तुम्हारी कविता
कुछ लिख कर
कह सुन कर
जी हल्का हो जाता है
ये भी लगता है
की चलो
किसी काम आये तो सहीं
मेरे शब्द
जिन्हें
या तो
मैं इस्तेमाल नहीं करता
नहीं कर पाता
वो सब
और
बहुत कुछ नया भी
शामिल हो जाता है
कविता में
मैं नहीं लिखता
ये खुद
मुझे
मेरी कलम सहित
कागज़ के पास
और
अब तो लेपटोप
के पास ले जाती है
मेरी उंगलिया
मेरे मन मष्तिष्क
के साथ
तारतम्य बिठाकर
निकालती जाती है
नए धागे
अनुभव के कोकून से
और फिर
मैं किसी
नौसिखिये जुलाहे की तरह
एक रंग बिरंगी
अनघड
बेढंगी सी
मगर
काम चलाऊ
कविता रच देता हूँ
फिर
उसे पढ़ता हूँ
बार बार
लगता है
इसे मैंने नहीं
किसी और ने लिखा है
और तब
नीचे लिखे
मेरे नाम को
पढ़कर
रोमांचित हो जाता हूँ
जब छोटा था ना
तो माँ को दिखाता था
हाँ
मगर पिता को कभी नहीं
उसी तरह
पत्नी से छुपाकर
और उन दोस्तों से भी
जिन्हें चुगली की आदत है
मैं अपने
साहित्यिक जगत के
आप जैसे
मित्रों से बाटने
निकल पड़ता हूँ
कभी डाकिया
कभी इश्तेहार बांटने वाला बनकर
फेरी लगा लगा
लोगो को पकड़ पकड़
अपनी रचना
पढाता , पढ़वाता
जब
बदले में
कोई भी
थोड़ी सी
प्रतिक्रया पा जाता हूँ
तो
मेरे पैर जमीन पर नहीं रहते
बस
उसी उड़ान का
अब मुझे
नशा होने लगा है
तो
एक कविता और
आप सबकी नज़र करता हूँ
और
उम्मीद करता हूँ
की
इस पाती को
इसके मनोभाव को
हर कविता प्रेमी
समझ जाएगा
और
जरुरत पड़ी
तो
मुझे भी समझाएगा !
--

Saturday, June 12, 2010

बूंद से सागर

सब प्रश्नों से पहले
समाधान बन
अवतरित हो दाता
मुझे यूं
मुक्ति का वरदान बन
मिले हो दाता
जान पहचान
तो केवल बहाना है
तुमसे ही
तुममे ही
खो कर
मिल जाना है

सागर से ज्यो
बादल बन
उडी थी बूंदे
फिर सरिता संग
तुममे आ मिलेगी
जीवन और जलचक्र
का रिश्ता
है पुराना
मगर
कितना है कठिन
इसे
समझ पाना |

फिर जल होकर
समझ आता है
कि
जीवन इकसार है
तुम भी
मै भी
वो भी
सब
वही अवतार है
मगर
बूंद बने हम
अपने
संशय
संकोच में
सरिता तक नहीं जाते
है पछताते
पूछते है
कि सागर क्यों नहीं बन पाते ?

Monday, June 7, 2010

(on Bhopal Gas Tragedy) भारत का हिरोशिमा

हमें जरुरत नहीं है,
किसी
पड़ोसी ताकत की
जो
हमें बर्बाद करने के लिए
खुद बर्बाद हो जाए
हमारे लिए तो
हमारे चुने हुए
प्रतिनिधि ही
किसी
परमाणु बम से
कम नहीं है
ये
किसी एंडरसन को
भोपाल तो दे सकते है
पर
भोपाल को
एंडरसन देना
इनकी औकात नहीं है
वैसे
औकात से पहले
इनकी नियत पे
शक होता है
और
नियत तक तो बात
तब पहुँचे जब
किसी के
इंसान होने की
भी
थोड़ी संभावना हो
भोपाल सबक है
विकास के पीछे
अंधी दौड़ में
शामिल
तथाकथित
विकासशील देशों के लिए
जो
अमेरिका
और
जापान
से
होड़ में
ऐसे कितने
हिरोशिमा
और
नागासाकी
लिए
बैठे है
भोपाल में
गैस अब भी
रिस रही है
तब इसमे
इंसान मरे थे
अब
इंसानियत
मर रही है !

Friday, June 4, 2010

हे राजनीति !

हे राजनीति !
तुम फिर चर्चा में हो
वैसे हर बार
तुम ही होती हो
हर चर्चा का कारण
मगर
इस बार
तुम
सोद्देश्य चर्चा में हो
उठ नहीं सकती
भाग नहीं सकती
जनता , नेता , अधिकारी
गुंडे , छात्र , व्यवसायी
गृहणी , प्रेयसी ,
माँ - पिता
दादा -पोता
अपाहिज , अछूत
अगड़ा पिछड़ा
.....
सब
यहाँ तक की
सभी
छोटे बड़े
भिखारी भी
चश्मों
और बगैर चश्मों के
देखेंगे तुम्हें
तथष्ठ भाव से
पहली बार
एकमत्त होकर
उस भाषा में
जो
अनचाहे
अनजाने
राष्ट्र भाषा
बन गयी है
"सिनेमा "

अब कोई मुद्दा
तुम तक आकर
विवाद
नहीं बन पायेगा
इस बार
तुम स्वयं
कटघरे में हो
ये
कच्चे सच्चे न्यायाधीश
अपनी
काली सफ़ेद कमाई से
काला सफ़ेद टिकट लेकर
स्वत: प्रतिबद्ध हो जायेंगे
भले
उनमे
राष्ट्रगान पर खड़े होने का
शऊर ना हो

तुमने जो
व्यस्त कर रक्खा था
उन्हें
मनघडंत
इतिहास ,
विवादास्पद न्याय
और
हास्यास्पद व्यवस्था
के
दुरूह ताने बाने में
अब वे
कुछ क्षण
आजाद होकर
अँधेरे में
उजाले की
किरण ढूंढेंगे

वहा परदे पर
नायिका नहीं
तुम्हारे कपडे उतरेंगे
सीटियों
गालियों
और
भड़ास के बीच

शायद
कथ्य ना सही
विषय ही
याद रह जाए
उन्हें
ताकि वो
तुम्हारा
दामन
फिर साफ़ कर सके
उस एक दिन
इस विषय को
याद कर
जिस दिन
तुम्हारी ही व्यवस्था
प्रचार पर
विराम लगाती है
चुनाव के
ठीक
एक दिन पहले

"राजनीति "
तुम्हारा स्वागत है
खुले मन से
के
तुमने ही
बदला है
जो पुराना था
अब
तुम्हे बदलना है
नया होना है
साफ़ होना है
काले धन की गटर
और
उसमे पनपे मच्छरों से
आजाद होना है
और
हमारी आजादी
वो तो अभी बाकी है
मेरे दोस्त ...
आजादी
अभी
बाकी है मेरे दोस्त !

Thursday, June 3, 2010

बादल कब बरसोगे ?

बादल कब बरसोगे ?
अभी !
या
बुवाई के बाद !!
देखो
तुम
वैसा मत करना
जैसा सब करते है
सामने से गुजरते है
मगर मिलते नहीं
पिछले सावन
ले गए थे
सुख चैन सारा
अब तो लौटा दो
कितना ब्याज
चढ़ आया है
लाला भी
अब
खेतों को
अपना समझने लगा है
उसकी भूखी नजरे
मांस नोचती है
बेटियों के
उघडे बदन से
तुम इस बार
कपड़ा बन बरस जाओ
रोटी बन बरस जाओ
तो चिंता छूटे
मगर तुम भी
बही खातों में
दर्ज हो
बढ़ता हुवा
कर्ज हो
सबके कर्मो का
हिसाब करते हो
तब
थोड़ा बरसते हो
तो
इस बार
उधार बन बरसों
खेती में खटते
पिया का
प्यार बन बरसों
ओ बादल
तुम
बहार बन बरसों
हमारी सरकार बन बरसों
जो
हरे पेड़ काटती है
हरे नोट छापती है
दारु कम्बल बाटती है
हां
तुम चुनाव बन बरसों

Wednesday, June 2, 2010

छोटी छोटी बातें

समय पर न्याय
उचित मूल्य पर सामान
करों से राहत
शिकायत पर सुनवाई
छोटो छोटी बातें है
जिनका कोई मोल नहीं

रिश्तो में सुविधा
सुविधा का रिश्ता
खाने खिलाने का शिष्टाचार
टूटे वादे
अच्छी यादें
छोटो छोटी बातें है
जिनका कोई मोल नहीं

आचरण की पवित्रता
आँखों में पानी
धर्म से सरोकार
कर्म में निष्ठा
छोटो छोटी बातें है
जिनका कोई मोल नहीं

सहजता
सुलभता
सब्र
अनुभव
आग्रह
सराहना
छोटो छोटी बातें है
जिनका कोई मोल नहीं

मगर
इन्ही छोटी मोटी बातों ने
जीवन को
मीठा बनाया
नमकीन भी
अब
सब खारा खारा लगता है
जीवन भंडारा लगता है

जहां
भीख को
प्रसाद कहकर
मन हल्का करते है
देते हुवे हाथ
लेते हुवे हाथ

खैर
सब छोटो छोटी बातें है
जिनका कोई मोल नहीं ...
!?!

Tuesday, May 18, 2010

परवाज

मैं
छोटा
मेरा मतलब
छोटा
मनसूबे
छोटे
होसले है
मगर
छोटे

लगा मत बैठना
मेरी
परवाज का अंदाजा
देखकर
ये मेरे
पर
छोटे

Sunday, May 2, 2010

मैं सिर्फ सच कहूंगा ...

मैं सिर्फ सच कहूंगा ...
सच के सिवा कुछ नहीं |
इतनी शपथ लेने के बाद
मैंने देखा
कोई नहीं चाहता था
सच सुनना
उस गहरी खामोशी
का मतलब
मैं समझ भी रहा था
और
सोच रहा था
तोड़
इस शपथ का
जो
मैंने
अभी अभी ली थी
पवित्र पुस्तक पर
हाथ रख कर
मैंने बहुत सोचा
पर
याद नहीं
मैंने
उस पवित्र पुस्तक को
कभी पढ़ा भी था
हां उसकी महिमा
मेरे जहन में भरी थी
जो
मुझे
रोक रही थी
शपथ तोड़ने से
मैंने फिर भी सोचा
कोई तो राह होगी
कि
कसम भी रह जाएँ
और
पुस्तक का मान भी
मैंने ये भी सोचा
क्या
पहले कभी
किसी ने भी
तोड़ी ना होगी शपथ
मुझसे पहले ?
फिर
ये किताब
वो कुर्सी
और
वो
न्यायाधीश
जीवित कैसे रहें??
क्या
भ्रष्ट व्यवस्था
श्राप
और
ईश्वरीय अवमानाओं से
कहीं ऊपर है? ??
आखिर
कब तक
शपथ का उत्तरदायित्व
मुझ अकेले को
ढोना होगा?
कौन करेगा
इनका फैसला ??
जो
साक्षी है
अनगिनत झूठी शपथों के
जो
अन्याय को
आश्रय देते हैं
उस किताब में
जिसे
संविधान कहते है||
जो
गीता
कुरआन
और बाईबल का
रोज अपमान करवाती है
हमारे अपने ही हाथों
और
हम मजबूर है
क्योंकि
धर्मनिरपेक्ष
और
इंडियन होने की
इतनी कीमत तो
चुकानी होगी ना ||

Tuesday, April 27, 2010

आम का मौसम है आम चूसिये

आम का मौसम है आम चूसिये ,
दो चार लेकर जेब ठुसिये
क्या पता ,
फिर
आम आम ना रहे
क्योंकि
एक चुनाव काफी है
आम के ख़ास होने को
ये डिटर्जेंट काफी है
सारे दाग धोने को
पर
ससुरे चुनाव भी
आजकल टलने लगे है
खोटे सिक्के भी
दस दस साल चलने लगे है !

एक आम सी दरख्वास्त है
हर ख़ास-ओ-आम से
जो गए हो
दफ्तर-ऐ-सरकार
कभी किसी काम से
मिले जरुर होंगे
आवाम से
जिसे
सलीका सिखलाते है
वो
ताकि
आम बना रहे आम
तभी तो
आम हर मौसम में
पकने लगे है
कुछ डालियों से पककर
टपकने लगे है
तुम
टपके हुवो की
जमात के दिखते हो
आम तो खा सकते नहीं
अलबत्ता
गुठलियाँ जरुर गिनते हो


गुठलियों से याद आया
आजकल
गुठलियों के भी
दाम मिलते है
इसलिए
बिना गुठलियों के भी
आम मिलते है
जो
बोतल में बंद
बड़े इंतजाम से आते है
कुछ नादान
आज भी
आम चूस के खाते है
गुठलियों से
पेड़ उगाते है
जिन्हें
सरकारी पशु
चर जाते है
आम आजकल
पनप कहाँ पाते है
जो थोड़े आम
बाजार तक आते है
ऊची कीमत पे
बिक जाते है
हमारे तुम्हारे लिए तो
वो केवल
विज्ञापन में नजर आते है
जहा
हर बार
कुछ नए जुमले
दोहराए जाते है
हम फिर
हसीं चेहरों
और
शीतल पेय से
भरमाये जाते है

तो
ऐ मेरे आम इंसान
अब तो पको
टपको
उगो
जड़े फैलाओं
जर्जर व्यवस्था की
नीव तक
ताकि
आम आम बना रहे
क्योंकि
आम तभी तक ख़ास है
जब तक आम है
आम से गुठली
गुठली से पेड़ ही
आम का सही अंजाम है |

Wednesday, April 21, 2010

अपने जन्मदिन पर खुद को ...

अपने जन्मदिन पर खुद को ...
आज उदास नहीं होउंगा
नाही निराश होने दूंगा
स्वयं को
थोड़ा मुश्किल है
जब
सब और से घेरा हो
अंधेरों ने
अगर ये रात है
तो मैं सो नहीं सकता
दिन है
तो रो नहीं सकता
थक नहीं सकता
बैठ नहीं सकता
रुक नहीं सकता
ना ही झुकूंगा कभी
अन्याय
और
अन्याय के परोक्ष
पक्षधरों के सामने
मेरे कंधे झुके जा रहे है
मगर
ये थकान है
निराशा नहीं
एक दिन इसे भी
जीत लूंगा
मेरा वादा है
खुद से !

Tuesday, April 20, 2010

गुलाम

फिर बनी
उनकी सरकार
सब
नौकर
हो गए
सता
पर
काबिज
फिर
संतरी और
जोकर
हो गए !
वंशवाद
और
सामंती
शासन की
स्मृती
मिटती नहीं
गुलाम
मानस से
परिवर्तन
से
जिनका
जी
घबराता है
वो
निश्चित ही
सिंह
की
संतान नहीं !

आक्रोश

निष्कर्ष पर
पहुँचने की जल्दी,
जड़ है ,
कलियुगी
अव्यवस्थाओं की
त्वरित
प्रतिक्रियाएँ ,
अनियंत्रित,
अनाधिकृत,
अपरिपक्व ,
अपरिष्कृत ,
आक्रोश
रोग बन चुका है |
ये महानगर
ऐसे
रोगियों को
बेहतर इलाज
का
आश्वाशन देते है |
यहाँ
आप
अपनी
जिंदगी बेचकर
दवा खरीद सकते है ,
दुवा भी ,
दवाएं
महँगी है बहुत ,
कारगर कितनी है |
कोई नहीं बताता
यहाँ |

इन्तेजाम

ढूँढना मुझे ,
जब खो जाऊ मैं
और
मेरी स्म्रतियों
के स्मारक बनाना
पर
अभी तो कोई बात नहीं
मैं जिंदा भी हूँ
और किसी काम
का भी नहीं
क्योंकि
मेरे नाम पर
कोई
अन्याय
कर ना सकोगे
मैं जो टोक दूंगा
सो
इन्तेजार करो
क्या कहा ...
इंतज़ार नहीं कर सकते !
तो ...
कोई
इन्तेजाम कर लो !

एक छोटी सी कविता

एक छोटी सी कविता ,
मेरी गोद में
आ बैठी ,
और बड़े प्यार से ,
मेरे कानों में ,
कुछ बोल गयी |
उसका मतलब ,
तो ना समझ पाया ,
अब तक ,
पर ,
उसका वो मेरी तरफ
आना
और
मेरी गोद में बैठना ,
साधिकार ,
निश्चय ही
वो एक लम्हा
बन गया
मेरे लिए ,
छंद भी ,
गीत भी ,
रस भी ,
सच है
कि जब कविता होती है
तो सब होता है |
और
जरुरी नहीं
कि
जब सब हो ,
और
कविता भी हो !

फिर कोई नयी बात

लो फिर एक "डेडलाइन",
एक और फिर कतार में ,
हर खबर खड़ी है ,
जैसे ,
किसी इन्तेजार में |
कि कई और भी बातें ,
कई और भी चेहरे,
सुने हुवे , देखे हुवे ,
बुने हुवे ,
हो सकते थे ,
इस किताब का अगला पन्ना |
पर
जीवन को किसने जाना है ?
किसने बुनते देखा है ,
चाँद वाली बुढिया को,
भाग्य के ताने बाने |
हमने भी कितनी ठोंकरे
मारी होगी ,
राह के रोड़ो को ,
और ये धुल ,
इसमे कही हम भी शामिल होंगे ,
एक आध कतरा,
कही उतरा भी होगा किसी कि साँसों में ,
कि ना जाने कितने ओठों पर ,
मेरी अनगिनत बातों का
उधार बाकी है |
ये सब और बहुत कुछ
और भी अनर्गल
सोच कर
जब
थक जाता हु
फिर कोई नयी बात
कोई नया ख्वाब
बुनता हु
देखो
मगर तुम
मेरी अगली
कविता का
इन्तेज़ार मत करना ||

Monday, April 5, 2010

इसलिए

आधी शताब्दी
बाद भी
मच्छर ,
मलेरिया ,
और
अशिक्षा
से
मुक्ति ना दिला पाया
प्रशासन
आतंकवाद से
सुरक्षा का
दावा करता है


इसलिए
हर घर में
कछुवा
जलता हैं
जिसका
अब
ज्यादा
जोर
नहीं चलता है


देश में
राजनीति की
दो-दो
धुरियाँ हैं
मगर
उनमे
मतभेद,
मनभेद ,
दुरी की
अनगिनत
सोची समझी
मजबूरियां है |


इसलिए
देश
एकमत होकर
मतदान
करता है
अपना पेट
काटकर
इनका
घर भरता है |


लगान
अब
नहीं
चुकाना पड़ता
पहले ही
काट लिया जाता है
जड़ों से


इसलिए
छोटे किसान की
फसल
और
मध्यमवर्गीय की
बचत
पनप
नहीं पाती

महंगाई
चढ़ता सूरज हैं
सर छुपाने से
क्या होगा ?
शाम तलक
खुदा जाने
अंजाम
क्या होगा ?


इसलिए
आशाओं को
इच्छाओं को
ढूंढ़ ढूंढ़ मारों
ये
अभिजात्य ,
सामंत
और
भ्रष्टाचारियों
की
दासियाँ हैं
तुम कभी
इन्हें
अपने घर की
शोभा
बना ना सकोगे |


अरे ओ !
मूढ़ ,
पढ़े लिखे श्रमिक
ज़रा
देश की
अर्थी को
कान्धा तो लगा
अभी
श्मशान दूर हैं
क्या पता
मुर्दे में
फिर
जान आ जाये


इसलिए
ऐ आम इंसान
अपनी भीड़ को
नियंत्रित कर
थोड़ा
हासियें पर होले
अभी
इस
राजपथ पर
एक
लाल बत्तियों
का
काफिला गुजरेगा
जिसे
कईं
खाकी जिस्म
सलामी देंगे
जिनकी
आत्माएं
उन्होंने
नौकरियों के एवज में
गिरवी रख ली है ...


नौजवानों ,
नौनिहालों ,
तुम
किसी बात का
शोक ना करना
रंज ना रखना
तुम्हारें तमाशों में
कोई
कमी
रखी नहीं जाएगी


इसलियें
शहीदों ,
देशभक्तों ,
और
जन सेवकों ,
विशारदों
की
भीड़ को
चीरता
कोई
क्रिकेटिया
भारत रत्न से
नवाजा जाएगा
अभी रुको
जलसा
ख़त्म नहीं हुवा
अभी
इसी मोड़ से
बस
थोड़ी देर में
देश का
जनाजा जाएगा |

Monday, March 22, 2010

इस तरह या उस तरह

सोने पे सुहागा रख दू ..
सोना चाहिए मगर
तो !!
तो कैसे रख दू?
कहा से रख दू??
अब..
कह तो दिया ,
रख दू ..
वो भी पत्नी से !
तो..
रखना तो पडेगा ना !
बुरे वक़्त के
घटिया दौर में
खटना तो पडेगा ना !
सो खट रहा हु
बढ़ने की चाह में
रोज..
रोज थोड़ा..
थोड़ा थोड़ा
घट रहा हु
और
और जिंदगी...
जिंदगी..जिंदगी नहीं
जोड़ , जमा , गुणा भाग लगती है
किसी गरीब का फूटा भाग लगती है
रोज ..
रोज की शिकायतें
शिकायतों की पुरानी लिस्ट
और ..
और उन्हें सम्हाल कर रखता मैं..
मैं !
किसी पुराने दफ्तर के
घिसे हुवे बाबू सा ,
खीसे निपोरता ,
बगले झांकता ,
पीएफ और ग्रेज्युटी
के सहारे
बुढापा सवारने ,
घर बनवाने के
मनसूबे लेकर
तमाम एहतियात
और बंदोबस्त से
थोड़ी..
थोड़ी रिश्वत ..
ले ही लेता हु ,
जिसमे
बड़े बाबू का भी तो
बड़ा हिस्सा होता है
वो..
वो जो होता है
सो होता है
मगर..
मगर ,ये तो आप भी जानते है !
उतने में आज क्या होता है ..
बेटी के गहने ,
बेटे का फेशन
क्या कहने ?
काम..
काम जनाब ..
कोई नहीं रुकता
सबकी अपनी जिद है
कोई नहीं झुकता |
एक मैं ही हूँ
जो
आज भी
स्वदेशी की आड़ लेकर
दो जोड़ी खद्दर
और
एक बण्डल बीडी पे
गुजारा कर लेता हूँ
कल्लू की कच्ची चढाकर
उसी से उतारा कर लेता हूँ
बच्चों का भविष्य..
अब
उनकी आँखों में
साफ.. दिखता है
अनुकम्पा नियुक्ति ही
..अंतिम उपाय दिखता हैं ..
मगर !
मगर, उसके लिए भी
मुझे ही
फिर...
फिर , मरना पडेगा
"स्वाभाविक मौत"
कागज़ ही पर सही
हाँ ..
ये काम करना है
जल्दी ही करना है
करना ही पडेगा ..
तो ..
तो मरने का
एक अच्छा.. सा बहाना
ढूंढ़ रहा हूँ
खोया बचपन
बेसुध जवानी
अपना-बेगाना
गुजरा ज़माना
ढूंढ़ रहा हूँ
सब साथी बुढा रहे है
खखार
खिसिया
सठिया रहे हैं|
उनसे
सहारे दिलासे की आस
मजाक लगती है
उनसे
अब
अपनी ही नहीं धुलती
जैसे
जब
पुरानी संदूक नहीं खुलती
तो
क्या करते है?
तोड़ देते है
कुण्डी ताला
बेच देते हैं
पुराने गहने
गाँव के सुनार को
और
टूटी संदूक
कबाड़ी को
उस पैसे से
बन जाती है
एक दीवार
दोनों भाइयों के घरों के बीच
वही
उसी दीवार की
किसी दरार में
उग आता हूँ मैं
पीपल की कोंपल बन
इस
आस में
के
तिड्केगी , टूटेगी
वो दीवार
जो
बरसों की नमी
मौसम और समय की मार से
पहले ही
दरकने लगी हैं
नईं पीढ़ी का कोई तरुण
तोड़ ही देगा इसे
जब
वो इसे लांघकर
इस तरफ आयेगा
अपनी किसी बहन को बचाने
या
मुझपे अटकी
पतंग उतारने ही सही..
क्या फर्क पड़ता है
मुझे तो
बस
मुक्त होना है
इस तरह्
या
उस तरह
क्या फर्क पड़ता है |

Wednesday, March 10, 2010

पुरुषों को 67% आरक्षण की बधाई !

पुरुषों को 67% आरक्षण की बधाई !

स्त्री को पुरुष ने
एक बार फिर छला है
तैतीस का झांसा देकर
सड़सठ का दाव चला है

आरी ओ माया
शक्तिरूपा
तेरी प्रतिनिधि
नायिकाएं भी
कर रही थी
हाथ ऊपर
जब
अहसान जताकर
तेरी
भावी सत्ता को
बता दिया गया
धत्ता


तेरी तरफदारी
मैं क्यों करू
क्यों तेरी फ़िक्र में
मरू
तेरी तकदीर में रोना है
अब मान भी ले
शोषिता !
तू पुरुषों के हाथ का खिलौना है ...

Saturday, February 13, 2010

एक चुप और ...

एक चुप और ...
शोषण
पर
साहित्य
देशहित
में
रात्रिभोज
और
गांधीवाद
समाजवाद
की
शोक सभाओ में
मंदिरा ...
लम्पट
युग
के
स्वच्छंद
व्यभिचार
को
न्यायसंगत
ठहराते
कुतर्क
और
इन सब
पर
सम्पूर्ण
गाम्भीर्य
से
आच्छादित
पत्रकारिता
का
पीत स्तम्भ ...
लोकतंत्र
को
अभिजात्य
का
खिलौना
बनाकर
उनके
नौनिहालों की
चिरौरी करता है |
हम
पढ़ते है
क्योंकि
पढ़ सकते है
और लोग
सुनते है
क्योंकि
इतना तो
वो कर ही
सकते है
और
कुछ
लोग
सोचते भी है
और
बहुत थोड़े
प्रितिक्रिया में
हु / हां
करते
कम से कम
सर हिलाते हैं
और
जो
करोडो में
एक आध
अभिमन्यु
उलझता है
इस
चक्रव्यूह से
उसकी
तो
खबर भी
बिक नहीं पाती !
सच है
एक चुप
ही
बचा सकता है
हमें
इस
वक़्त के
दावानल से !

क्षण

सोचा था
आज
जरुर
लिखूंगा
करूंगा
कुछ !!!
सार्थक
पर
तय
नहीं कर पाया हूँ
अब तक
कि
कैसे
निरर्थक
निर्भिप्राय
ही
नष्ट
कर सकते है
हम
क्षण को
क्या
ये
वाकई
संभव है
यदि हाँ
तो
मान लो
कि
तुम ही
सृष्टा हो
नियंता हो
स्वयं के
समय के
सभी आयामों
और
अनुमानों के
और
यदि
नहीं !!!
तो
कब
कुछ भी
निरर्थक
निराभिप्राय
गुजरता है
किसी भी
क्षण ?

मत भूल जाना

यू
संभावनाओं में
कल्पना से
सृजित
समस्याओं
के
समाधान
अब
चलन में हैं
बस
किसी तरह
इसे
उस
गरीब
को समझा सके
तो
सरकार फिर
अपनी
बनेगी
वो
मुरख
इतनी
आसानी से
बहलता
भी नहीं
इसके लियें ही
जतन
कियें है
हमने
हर गलीं
हर नुक्कड़ पर
शराबखानें
सस्तें
सुलभ
तम्बाकुं के
गुटाखें
और
बड़ी
मुश्किलों से
अनपढ़
बना कर
रखी जनता
के लियें
बारीक
अक्षरों में
लिखें
वैधानिक चेतावनियों
वालें
बीडी और सिगरेट
के
बाद
हमारा
अभिनव
प्रयास
है
कि
गलीं गलीं
प्रबंधन की
डिग्रीया
प्रसाद कि तरह
बांटने वाले
महाविद्यालय
नाम कि
दुकाने
खोली जाएँ
ताकि
नई पीढी
गलती से भी
गरीब
और
सर्वहारा
के
उत्थान
जैसा
विवेकहीन
कदम
उठा ना सके
अरे !!
ये
नींव के पत्थर है
दबे रहने दो
तभी तक
टिकी है
हमारी
गगन चूमती
अट्टालिकाएं |
आओं
अधिक से अधिक
महिलाओं
और
युवाओं
को
इनका नेता बनाएं
पर
मत भूल जाना
कि
वो
महिला तुम्हारें
या
नेताजी के
घर कि
ही हो
और
देश
का विकास
तो तभी
संभव है
जब
युवाँ भी
पार्टी अध्यक्ष
का
बेटा / बहु / बेटी
ही
हो !

यादो में सही |

कोई नहीं छूटा
सब वही है
पर
यादों में
चलो
ऐसे ही सही
समय
और
नियति
के
दुरूह चक्र
में
नित्य बदलता
जीवन
इसमे
वो रस कहाँ
जो
अतीत की
जुगाली में है
वहाँ
बूढी नानी
अब भी
वैसे ही
खट्टे मीठे
स्वाद लेकर
कभी
नाश्ते पर
कभी
दोपहर के खाने पर
इंतज़ार कराती है
और
आँगन का
बड़ा नीम का पेड़
अपनी
घनी छाव
और
ढेर सारी
हरी लाल पिली
निम्बोरिओं के
साथ
खडा है
वह
खंडहर
आज भी आबाद है
बचपन की
छुपा छुपी से
और
तुम दोस्त
कहीं छुपें हो
तुम्हें
ढूंढ़ ही लूंगा
एक दिन
फिर
तुम्हारी बारी होगी
और
मैं छुपुंगा
तब तक
युही
मिलते रहना
सपनों में सही
यादो में सही |

लय/ छंद में


अम्बर में धरा में
जीवन में
धरा क्या है ?
सोचा, कहा, सुना ,देखा
सही ,
किया क्या है ?

वह भूल से
भूलकर भी
भूलता नहीं
फिर भी
याद करता है ,
पर
याद नहीं
भुला क्या है ?

रसिक है बहुत ,
धनिक भी है
बलवान भी बहुत
जीता, जिया , खाया , पीया ,
प्यारे
गढा क्या है ?

गिरते को उठा ,
खुद संभल ,
बन उजाला
अंधेरों में
लगी ठोकर
गिरा कोई
देखता तू अब भी
खड़ा क्या है ?

मुश्किलों से बड़ी मुसीबत ,
हर मुसीबत पे बड़ा आदमी
अहम् है स्वार्थ है
उनपे खुदा ,
नहीं पता
उससे बड़ा क्या है ?

कृष्ण !


किसके लिए लिखू ,
क्या लिखू क्यों भला ,
इतना सोचकर ,
तय किया ,
कृष्ण के लिए लिखू ,
क्यों ?
कृष्ण ही क्यों ?
क्योकि
वह कृष्ण है |
उतना ही काफी है
मेरे लिए
कृष्ण को
सन्दर्भ करने को
बहाने नहीं खोजने होते
वह यही होता है
हमारे आसपास
हमेशा
खेलता रहता है
ओठों पर
मधुर मोहिनी मुस्कान
और
बांसुरी के साथ
जब वो
नहीं दिखाई देता
उसके स्वर
सुनाई देते है
तब वो
और भी
निकट होता है .
कैसे बताये कोई ,
क्या है कृष्ण ?
मैं बस इतना
कह सकता हू
क्या नहीं है ...
कृष्ण !

स्वयं से


तुम संकल्प हो ,
श्रष्टा हो स्वयं ,
स्वयं ही
खोजते हो
स्वयं को
स्वयं में ,
क्या हो प्रभो !
जगन्नाथ हो
जगदीश्वर हो
दाता तुम्ही हो
स्वयं से
माँगते हो
स्वयं को
देते हो
स्वयं को
स्वयं ही
क्या हो प्रभो !
नहीं जानना मुझको ,
नहीं आती समझ
ये लीलाये तुम्हारी
पर
मै
मेरा विस्मय
और
विवेचना भी
सब
तुम ही तो
हो प्रभो !
स्वयं प्रश्न हो
उत्तर स्वयं
स्वयं से
पूछते हो
क्या हो प्रभो !

अमूल्य हो गया हु !

नित डूबकर
उस नाम रस में
अब
आनंद आता है
अधिक
नहीं जाना था
ये सुख पहले
और
यु ही
नित्य
शिकायतों की टोकरी
भर भर
लगाता रहा फेरी
कोई
मोल नहीं करता
आसुओं का
टूटी आस और
उखड़ती साँसों का
तुम अनूठे धनि हो
पहले ही
चुन लेते हो
उसे जो
सर्वथा निरर्थक है
मूल्यहीन है
जगत के लिए
नहीं कोई
तुमसा सौदागर
तुम्हारे स्पर्श से
जगत शेठ
धनि हो गया हु
अमूल्य था पहले
अब
अमूल्य हो गया हु !

तभी ...

तभी ...

बहुत हिम्मत चाहिए
खुद को बौना करने के लिए ,
ये दुनिया
तभी
दिखेगी महान
और
आप वहा होंगे
जहा
आप होना चाहते है
जैसे लोगो के बीच
बस
बन ना सकेंगे
वैसे
जैसा आप
चाहते थे
पर
शर्तिया
खुद को बेहतर ही पायेंगे
चाहे जिस तरह
फिर
आप देखे
या
कोई और !
--

प्रेम क्या है ?

प्रेम क्या है ?
क्या लव , प्रेम है ?
क्या लव ही प्रेम है ?
या ,
लव भी प्रेम है ?
फिर
प्रीत , प्यार, समर्पण
त्याग , अनुराग , और
बहुत कुछ
जो
हम करते है
उन सब से
जो
बदले में
लौटाते है
एक अहसास
जिसमे
उष्मा होती है
पहल होती है
परिणाम की परवाह
नहीं होती
ना होता है
अहम् का भाव ही
वो क्या है ?
जहा
सत्य , प्रेम और करूणा
साथ होते है
एक नजर आते है
जहा
हम जुड़ते है
औरो से
स्वयं से
फिर ना टूटे ऐसे
वही
ध्येय है
मतवाले मन का
वही
घर है
मेरे प्रीतम का

- प्रात: स्मरणीय पु. संत मोररी बापू के सादर चरणों में सादर समर्पित !

आज कुछ ना कुछ लिखूंगा जरुर ,

विषय कोई भी ,
भाव कोई हो चाहे ,
लय मिले ना मिले ,
कहा योग बनता है ,
इस आपाधापी में ,
के
कर सकूँ मन की ,
कर सकूँ
कुछ
सार्थक सा |
क्या पता ,
कल के लिए
ये शब्द ही
बन जाएँ पूंजी ,
और
इन्ही का पुल बनाकर ,
शायद
पांट सकूँ,
सदियों की
उस दुरी को
जो
मेरे और तुम्हारे
बीच है
चाहे भाषा, रंग , जन्म
या ऐसे ही किसी
मनगढ़ंत अन्धानुकृत निर्मूल
बेमतलब भारी से
मगर
मात्र नाम के आधार |
यकीं करों !
मेरा नहीं यार
अपना ही
बस एक बार
सब और से
आँखें मूंदकर
समेट सहेज कर स्व को
देखो
उस आस्था की जमीन को
जिसमें
विश्वाश का अंकुर
फूटना चाहता है
बस थोड़ी करुणा
और प्रेम से सिंचों
कभी कभी
तर्क और व्यवहार से परे जाकर
सहज
इंसान
महज
इंसान
बनकर
कर डालो
कुछ
अकर्म ही !

Tuesday, January 19, 2010

ध्येय

ध्येय

संकटों
की
काली छाया
के उस पार
उम्मीदों
के क्षितिज पर
ये लालिमा
देखों
संकेत है
की
नियति
रच रही है
तुम्हे
रिझाने
मनाने
के
नए अध्याय
की
अब
फिर
कल ही की तरह
तुम
फिर
करवट बदल
उठ बैठोगे
और
चल पडोगे
उस और
जो
तुम्हारा
ध्येय नहीं
बल्कि
तुम
जिसका
ध्येय रहे हो
सदा से !