Thursday, May 26, 2011

व्याख्याएँ


एक शब्द में 
समेट लेता था
मैं पहले 
रिश्तें ,
आदर 
और 
संवेदनाएं |
तुमने जब तक 
दिए ना थे 
प्रचलित पर्याय |
नाकारों ने 
पीकदान की तरह
थूक रक्खे है ,
चारो तरफ 
सरकारी दीवारों ,
धर्मशालाओं 
और मंदिरों के 
पवित्र प्रान्गनो तक...  
द्विअर्थी मुहावरे 
जिनके बीच 
दुरूह हो गयी है ,
आत्मीय शब्दों की 
सहज व्याख्याएं 
और हम हैं कि 
घुसने देते है ,
इस शब्द प्रदूषण को 
घर के भीतर 
जहां 
बच्चे भी 
तुतलाते हुवे 
जवान हो गए है 
अचानक !!!
नहीं बंधू !
सब अचानक ही तो 
नहीं होता ना 
हमेशा ...



Friday, May 20, 2011

मुझे शर्म आती है इंडियन कहलाने पर





अंग बंग चौक चंग
चौकचौबारा 
चौसर या चौपड़ 
गिल्ली डंडा 
पतंगबाजी
कंचे 
कबड्डी 
खोखो 
देखो तो 
ढूंढो तो 
पाओगे 
खेलो का असीम 
अद्भुत संसार 
जो सिर्फ यहाँ है 
और हम 
जुटे है 
शराब और शबाब परोसने 
जुवे की जुगत भिडाने को 
करवाते है आई पी एल 
जहां 
चंद भांड 
उच्च कोटि रंडियां 
भाड़े की नाचानियाएं 
विलासिता में आकंठ डूबे 
नंगे घराने  
राजनीतिक और मीडियाई दल्ले 
आग मूतते है 
जिसे देखने को 
आतुर भ्रष्ट उच्च मध्यम वर्ग 
जुगत भिडाता है 
तब मुझे 
गरीब पिछड़ा मध्यम भारत
दूर देहातों 
डूबते कस्बों 
में कसमसाता 
नजर आता है 
जिसे उसका ही बनाया  तंत्र 
विलासिता के गुड से 
मक्खियों की तरह
उडाता है 
स्वराज्य की ऐसी कत्लगाहों के 
पहरे पर 
उसे 
अपना ही कोई बेटा 
डंडे घुमाता 
ठेला लगाता नजर आता है  
बस इसीलिए 
वो भारतीय कहलाने पर 
इतराता है 
और 
इंडियन कहने पर 
शर्म से गड़ जाता है |
हां 
मुझे भी नाज है 
हिन्दुस्तानी होने का 
और शर्म आती है 
जब तुम मुझे 
इंडियन कहते हो 
जैसे मैं ब्रिटिश हुक्मरानों की 
छोड़ी हुई  
नाजायज औलाद हू 
कृपया मुझे भारतीय रहने दे 
मुझे गाली ना दे 
इंडियन ना कहे |


Thursday, May 19, 2011

अथ भ्रष्टासुर वध कथा - भाग २



क्रमश: भाग १  से  आगे  



जनदेव के लिए
समाधि के 
वह छ: दशक 
यू ही बीत गए 
सोते संबल के 
सब क्षण में रित गए 
जैसे दूध फट जाता है 
गिरते ही अम्ल की बूंद 
बहुत विकल्प 
तलाशते / तराशते 
जनदेव अब 
बुढ़ाते से लगने लगे 
उनकी चिर यौवना सखी 
सौन्दर्य स्वामिनी 
सत्ता तब प्रकट हुई 
समस्त वैभव 
और पूर्ण प्रभाव के साथ 
आलोकित हो उठे 
जन गण मन प्रफुल्लित 
तब 
मंद स्मित से 
बोली वह 
हे प्राणाधार 
आपको नहीं देख पाती हूँ 
यू विवश व्याकुल अधीर 
क्यों सूखा जा रहा 
प्रभु के मुख का नीर 
यू शुष्क गात 
पिचके कपोलो को 
अब सह ना पाउंगी 
स्वामी , व्रहद्द जग को 
क्या मुह दिखाऊंगी 
जब की सत्ता ने बहुत चिरौरी 
कुछ अस्फुट सा बोले 
पहली बार जनदेव 
"दिल्ली चलो " देवी 
दिल्ली चलो ...

देखिये अब दिल्ली में क्या कुछ हुवा सो तो जनदेव जाने ,लगी हुई है  सत्ता उन्हें दिल्ली भिजवाने सो तब तक भक्तों धीरज धरो और बोलो जय जय जनदेव ! दिल्ली चलो जनदेव ! दिल्ली चलो जनदेव !

आगे ...



Wednesday, May 18, 2011

अथ भ्रष्टासुर वध कथा भाग १

  

सोये थे जनदेव 
भोगनिन्द्रा में
तन्मय हो 
लिप्त थे 
नित्य क्रीडा में 
तभी 
भ्रष्टासुर आ धमाका 
ठीक सिर पर 
प्रभु जागे नहीं
उनींदे ही 
पूछ बैठे 
कौन वत्स भ्रष्टासुर ...
तुम तो हो गये हो
दुराचारी 
और 
दुर्घर्ष भी 
समाचार सब 
नारद जी 
फैला रहे है 
तमाम माध्यमो पर 
नित ही तुम 
तोड़ते हो 
स्वयं ही के कीर्तिमान 
याद नहीं पड़ता 
कैसे !
कब !!
उद्भव हूवा 
सो कथा तुम ही कहो 
मेरी ओर से नि:शंक रहो ...
प्रभो , बोला भ्रष्टासुर 
परिचित 
विनीत स्वर में 
आपकी ही 
उपेक्षाओं से जन्मा हूँ 
अवसरवादिता 
और 
सुविधावृत्ति ने 
पालन किया 
मां  लक्ष्मी की 
रही कृपा बरस 
आपसे क्या छिपा भगवन 
बढ़ रहा हूँ 
कलिकाल की 
अनुकूलता में 
पल पल हर क्षण 
क्षुधा से 
आकुल हो 
इस द्वार आया हूँ 
आप ही शेष रहे  
शेष सबको तो खा आया हूँ !
अब कुछ 
तंद्रा में विध्न पडा 
तो विचलित हो 
बोले जनदेव 
मुर्ख 
जानता नहीं 
मेरी ताकत 
मेरी सहमति 
और मौन से ही 
रहते है 
भ्रष्ट सारे सत्तासीन 
दीर्घायु अभामंडित सदा 
मेरे अन्दोलनास्त्र की 
एक फूंक से 
ध्वस्त कर सकता हूँ 
तुझ जैसे सहस्रों को 
तेरे लिए तो 
मेरा शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही 
पर्याप्त है 
अट्हास से भ्रष्टासुर  की 
दहल उठा था नभमंडल तब 
जनदेव, भले आप पूज्य हो 
और समर्थ भी 
भेद ना सकेंगे 
मेरे संगठित 
बेशर्मपुर गढ़ को 
और 
मेरे लिए तो 
आप ही ने  दिया था 
संविधान का कवच 
भूल गए प्रभु !!!
ओह , बड़ी भूल हुई 
जनदेव अब भी 
मूर्तिवत सोच रहे है 
क्या पता 
समाधि में है 
या भ्रष्टासुर  ने 
बना दिया 
उन्हें भी जड़ ...

कथा अभी शेष है , कृपया प्रतीक्षा करे , जय जय जनदेव !
आगे ...

Tuesday, May 17, 2011

मैं क्या कह दू


मैं क्या कह दू
खुद से
कि
मौन हो जाऊ
बंद कर दू
व्यर्थ जतन सारे
स्वयं को ही
मनाने के
आते हो जब मुझे
सौ बहाने
रूठने के
टूट जाने के
अपनी ही
गलियों में
भटकता
फिर रहा हूँ
सदियों से
तुम ये कहते हो
तुम जान पाए थे
कि जिस लम्हे
मैंने धरा था मौन
और तुम बौखलाए थे
मैंने
मुखर होना
वही तो सीखा था
वहीँ
कुछ हुनर भी
आजमाए थे |


Sunday, May 15, 2011

उसमे वो आग अभी बाकी है



खबरे पढ़ कर 
जी करता है 
अखबार जला दू 
ख़ुदकुशी कर लू 
गोली ही मार दू 
समाज के नासूरों को 
फिर 
कुछ सोच कर 
रोता हूँ
हँसता हूँ 
मन बदल लेता हूँ 
दर्शन की आड़ ले लेता हूँ 
खुद को 
बहलाता हूँ 
औरों को 
समझाता हूँ 
बस 
बहस नहीं कर पाता 
किसी युवा से 
क्योंकि 
अगर उसने ठान ली 
तो मैं जानता हूँ 
सब बदल डालेगा 
होम हो जाएगा 
बदलाव के हवन में 
मैं जानता हूँ 
क्योंकि 
मैं भी 
कभी 
ऐसा ही हुवा करता था  
टटोलता हूँ 
भीतर 
कही वो आग 
शायद अब भी बाकी हो ...
-- 

Thursday, May 12, 2011

अदद एक ईमानदार रचना के लिए



प्रयास रत हूँ मैं 
जूझ रहा हूँ 
स्वयं से 
अपनो से 
परायों से 
व्यवस्था से 
कि 
लिख सकू 
चिर प्रतीक्षित 
ईमानदार रचना 
जिसमे 
उघाड़ दूँ 
स्वयं और समाज को 
मर्यादित ही 
अनावृत्त कर दू 
मानवीय संवेदना के 
आदि स्रोत 
और 
उसके प्रयोजन को 
निहितार्थ को  
परिणिति को 
सरल 
सहज शब्दों 
और 
शुद्ध 
आडम्बरहीन
रचना द्वारा 
गाई भले ना जा सके 
पचाई जा सके 
ऐसी 
सर्वकालिक 
मौलिक रचना का 
आपकी तरह 
मुझे भी 
इन्तेजार है  ...

Friday, May 6, 2011

अक्षत


अक्षत 
कुछ पुष्प 
और 
अक्षत के 
दानो से 
रीझ जाते है 
देवों के अराध्य 
ऐसा 
क्या है 
कि अक्षत के 
आधे ही 
दाने से 
तृप्त 
हो जाती है
वसुंधरा 
और 
सुदामा को 
मिल जाता है
अतुल्य वैभव 
निश्चय ही 
निश्छल 
भाव ही 
होता है 
अक्षय 
और 
स्वीकृत 
उन चरणों को  
जिन्हें 
मां लक्ष्मी 
सराहती है | 
सभी सह्रदय भगवद भक्तों को अक्षय तृतीया की पुन्य वेला पर अक्षय शुभकामनाये |

ॐ श्री लक्ष्मी नारायणाय नम: |


Thursday, May 5, 2011

कठिन है मुसलमां होना




रोज
खबरों पर 
मिडिया में 
खुद को
देखते 
पढ़ते 
सुनते 
समझ 
बौराने लगी है  
एक मेरे सिवा 
सब को 
फ़िक्र है 
मेरी नहीं 
मेरे मजहब 
और 
उस पर चिपके 
पैबंद की 
मैं भी 
"जिहाद "
चाहता हूँ 
जहालत 
गरीबी से
निजात चाहता हूँ 
मगर 
लगता है 
आसान है 
ऐसे ही 
खबरी मौत 
रोज मरना 
सचमुच 
बहुत 
कठिन है 
जीना 
जी कर 
मुसलमा होना ...

इस्लाम 
एक पिंजरा है 
जो 
उड़ना चाहता है 
और 
बंद भी रहना 
भीतर से !!!

वो रोज अनशन करता है


वो रोज अनशन करता है  

फुटपाथ पर 
झोपड़ों में 
जंगलों 
दुरान्चलों 
और 
तुम्हारी गली में भी 

भूख 
और 
गरीबी के खिलाफ 
जो 
रची 
थोपी 
गयी है 
पीढ़ी दर पीढ़ी  
उनके 
और 
उनकी 
संतानों द्वारा 
इन पर 
इनके 
बाप 
दादाओं पर 
वो 
तभी से 
अनशन पर है 

उसकी 
मंशा है 
कि 

कोई भी 
कभी भी 
तुड़वा सकता है 
उसका
अनिश्चितकालीन 
आमरण अनशन 
देकर 
एक टुकड़ा 
बासी रोटी 
सड़ा अनाज 
या 
जूठन ही 
मानवता के 
उत्सवी जनाजों की 

उड़ती उड़ती 
अफवाह है 
अब 
इसका भी 
बड़ा बाजार है 
वो मायूस तो है ही 
मरने को है 
ये जानकर कि 
भूख 
अब डर नहीं 
साधन बन गयी है 
डराने का 

वो जो 
नगर चौक पे 
गद्दों पर पसरा 
भीड़ से घिरा 
अनशना रहा है 
कुंवर है 
ऊँचे घराने का  |

अनशन 
अब सीढ़ी है 
स्वार्थ की 
इससे निबटना 
जानती है 
सामंती सत्ता 
वो डरती नहीं 
आकलन करती है 
भीड़ में 
विरोधी वोटों का 

उसका 
आमरण अनशन
हमेशा 
सफल रहा है 
मरण बन कर 
उसके साथ ही  
मिट जायेगी 
भूख 
गरीबी 
और 
नाकामियाँ 
नाकारा 
सरकार की |

Tuesday, May 3, 2011

वादा रहा जिंदगी !



बहुत बैचैन हूँ 
बेसब्र हूँ 
कुछ कह ना बैठूं 
कर ना जाऊं 
ऐसा 
कि 
पछताना पड़े 
मुझे 
और 
मेरे अपनो को 
बहुत अरमां 
संजोये है 
जिंदगी 
तेरे साथ 
तू रहे 
आबाद रहे 
तो 
तेरे साथ 
बहुत 
दूर का 
वादा रहा... |