Tuesday, January 10, 2012

कागज़ की नाव है कविता


कविता 
जैसे कागज़ की नाव 
समय सागर में 
किनारे ढूंढ़ती सी 
तैरती रहती है 
नि:स्पृह ...
छूती है 
परम को सहज ही 
नहीं छूती 
समय को 
या समय ही 
तैरता है 
उस नाव के नीचे 
उसी परम-आदर का 
शब्दरूप है "गीता"

भगवत गीता रूपी कालजयी रचना करने वाले मात्र कवि श्री कृष्ण के परम चरणों में सादर समर्पित , उन्ही की रचना ... जय श्री कृष्ण !


3 comments:

  1. आदरणीया ,
    आपसे सदा ही आशीष मिलता रहता है , आपके सतत उत्सावर्धन के लिए अकिंचन धन्यवाद स्वीकार करे |
    स्नेह व आशीष बनाए रखे --
    With Regards
    Tarun Kumar Thakur

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