Thursday, March 9, 2017

अहो ! सिर्फ नारी हूँ मैं !




मनुष्य कहाँ हूँ 
पशु से भी 
कमतर 
ढकी हुई 
लाचारी हूँ मैं !

संविधान के 
लच्छेदार 
अनुच्छेदों में 
उलझी हुई 
बीमारी हूँ मैं !

धर्मग्रंथो की 
ग्रंथियों में 
कुंठित 
शापित 
महामारी हूँ मैं !

विश्वपटल के 
क्रियाकलाप पर 
नैतिकता सी 
भारी हूँ मैं !

माँ 
पत्नी 
बहन 
बेटी 
हो बटी हुई 
हिन्दू मुस्लिम में 
कटी हुई
भाषण कविता में 
रटी हुई 
भूल गयी थी 
नारी हूँ मैं !

निर्लज्ज 
पौरुष के 
लम्पट 
कपट भवन में 
दबी हुई 
चिंगारी हूँ मैं ..... 



NO
PUBLIC or PERSONAL LAW (?)
ONLY
WOMAN'S LAW 
may change the scene

2 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (15-10-2016) के चर्चा मंच "उम्मीदों का संसार" {चर्चा अंक- 2496} पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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